मुनिधर्म का स्वरूप

प्रथम किस्त

इस विषय पर कुछ भी लिखने से पूर्व यह स्पष्ट कर देना अपेक्षित समझता हूँ कि यह आलेख किसी की भी निंदा, स्तुति, समीक्षा, कटाक्ष या पूर्वाग्रह से नहीं लिख रहा हूँ | समाज के कई जिज्ञासु और विद्वान् इस विषय में तथ्यात्मक-जानकारियाँ देने के लिये लंबे समय से मुझसे …और पढ़ें


द्वितीय किस्त

पिछली किस्त में मुनिराजों/ साधुओं का अनिवार्य अंतरंग-स्वरूप जिनागम के आधार पर स्पष्ट किया था | उसी क्रम में अंतरंग एवं बहिरंग-- दोनों प्रकार की विशेषताओं का समन्वय करते हुये जो साधु-स्वरूप-वर्णन जिनागम में मिलता है, उसे संक्षिप्तरूप में …और पढ़ें


तृतीय किस्त 

कल जो द्वितीय किस्त दी थी, उसके सुधी-पाठकों ने 'लिंग' शब्द के प्रयोग और उसके अभिप्राय को स्पष्ट करने की अपेक्षा प्रकट की है, अतः संक्षेप में इस बात को स्पष्ट कर रहा हूँ, 'लिंग' शब्द का प्रकरणगत अर्थ व आम्नाय: यहाँ साधु के बाह्यचिह्नों को 'द्रव्यलिंग' एवं…और पढ़ें


चतुर्थ किस्त

जैनसाधु भोजन के लिये साधु नहीं बनते हैं; पर पड़ोसी- शरीर पर उपकार के लिये, संयम की रक्षा के लिये, तप की आराधना के लिये, श्रावकों में संस्कार के लिये, धर्म की प्रभावना के लिये मुनिराज शास्त्रोक्त-विधिपूर्वक आहारचर्या करते हैं | चूँकि…और पढ़ें


पंचम-किस्त

भैक्ष्यशुद्धि की विधि : कुछ अन्य तथ्य मौन :--- यह भैक्ष्यशुद्धि का महत्त्वपूर्ण अंग है | आहारचर्या का संकल्प लेने से लेकर आहारविधि पूर्ण होने के बाद तक मुनिराज अखंड मौनव्रती होते हैं | यहाँ तक कि वे किसी भी प्रकार के संकेत , ध्वनि या मुद्रा द्वारा कुछ भी कहने या बताने की चेष्टा नहीं करते हैं | यहाँ तक कि…और पढ़ें


षष्ठ किस्त

भैक्ष्यशुद्धि, कल एक सज्जन ने जिज्ञासा प्रकट की थी कि "मुनिराज आहार-ग्रहण वास्तव में क्यों करते हैं?"…और पढ़ें


सप्तम किस्त

भैक्ष्यशुद्धि-विषयक वर्णन, एक प्रश्न आया था कि "पहले मुनिराजों को 'वनवासी' ही कहा गया है | मात्र आहारचर्या के लिये ही ग्राम/नगर में आना और फिर वन में चले जाना ?--- यह क्यों कहा गया? ग्राम/नगर में रहकर वे भव्यजीवों को उपदेश व मार्गदर्शन देकर उनका उपकार करें,…और पढ़ें


अष्टम किस्त

भैक्ष्यशुद्धि के कुछ अन्य तथ्य मुनिधर्म की आहारचर्या के अंतर्गत कुछ अंतरायरूपी मलदोष कहे गये हैं, जिन्हें टालकर (जिनसे बचकर) वे आहार ग्रहण करते हैं | यदि ये दोष आ जायें, तो…और पढ़ें


नवम किस्त

भैक्ष्यशुद्धि के छियालीस (46) दोष मुनिराज की आहारचर्या में निम्नवर्णित छियालीस (46) दोषों की पहिचान व उनका निवारण अनिवार्य है | इन छियालीस दोषों को इस प्रकार…और पढ़ें


दसवीं किस्त

भैक्ष्यशुद्धि के छियालीस दोष :--- पिछली किस्त में 'अधःकर्म ' आदि 16 दोषों का संक्षिप्त-विवरण दिया था | अब उसके आगे धात्री आदि सोलह (16) उत्पादन-दोषों का संक्षिप्त-विवरण निम्नानुसार प्रस्तुत है…और पढ़ें


ग्यारहवीं किस्त

भैक्ष्यशुद्धि के छियालीस दोष :--- अब तक भैक्ष्यशुद्धि के छियालीस दोषों में से बत्तीस दोषों का वर्णन हो चुका है | इस किस्त में दस प्रकार के 'अशन-दोषों ' का…और पढ़ें


बारहवीं किस्त

भैक्ष्यशुद्धि के छियालीस दोष :--- इसके अंतर्गत अभी तक आप सोलह प्रकार के 'उद्गम-दोष', सोलह प्रकार के ' उत्पादन-दोष' एवं दस प्रकार के…और पढ़ें


तेरहवीं किस्त

आहारदाता के गुण :---मुनिराज के आहारदान के विवेचन-प्रसंग में आहारदान की विधि के विषय में संक्षिप्त-विवरण प्रस्तुत करने के उपरांत अब…और पढ़ें


चौदहवीं किस्त

भैक्ष्यशुद्धि में पात्र की विशेषता :--अभी तक मुनिधर्म के वर्णन के अन्तर्गत भैक्ष्यशुद्धि में 'विधि' और 'दाता' की विशेषताओं का संक्षिप्त-विवरण प्रस्तुत किया है | इस किस्त में …और पढ़ें


पन्द्रहवीं किस्त

भैक्ष्यशुद्धि में द्रव्य-शुद्धि:--मुनिधर्म की भैक्ष्यशुद्धि के अन्तर्गत विधि, दाता, पात्र की संक्षिप्त-चर्चा केे उपरान्त आज की किस्त का वर्ण्य-विषय है…और पढ़ें


सोलहवीं किस्त

मुनिधर्म का अनिवार्य-पात्रता एवं विधि:--मुनिधर्म अंगीकार करने के लिये जिनाम्नाय में क्या क्या अनिवार्य और आवश्यक निर्देश मिलते हैं,…और पढ़ें


सत्रहवीं किस्त

मुनिधर्म के अट्ठाईस-मूलगुण:--वैराग्य के अनुगामी भव्यजीव मुनिधर्म अंगीकार करने के उपरान्त मुख्यतः तो स्वरूप में…और पढ़ें


अट्ठारहवीं किस्त

अट्ठाईस-मूलगुणों में पंच-समितियाँ :---मुनिधर्म के अट्ठाईस-मूलगुणों में पंच-महाव्रतों के बाद पंच-समितियों का विवेचन क्रमप्राप्त…और पढ़ें


उन्नीसवीं किस्त

मुनिधर्म में 'पंचेन्द्रिय-विषय-जय':---मुनिधर्म के विवेचन में पाँच महाव्रतों एवं पाँच समितियों का संक्षिप्त-विवेचन करने के बाद आज मुनिराजों के पंचेन्द्रिय…और पढ़ें


बीसवीं किस्त

मुनिधर्म में आवश्यक-कर्त्तव्य :--मुनिधर्म मेें अट्ठाईस-मूलगुणों के वर्णन में अब तक अतिसंक्षेप में पाँच महाव्रतों, पाँच समितियों एवं पंचेन्द्रियजय पर विवेचन प्रस्तुत…और पढ़ें


इक्कीसवीं किस्त

मुनिधर्म के आवश्यक कर्त्तव्य :-- आज की किस्त में मुनिधर्म के षट् आवश्यकों में से दूसरे आवश्यक 'स्तव' पर चर्चा की जायेगी, जो कि समता या…और पढ़ें


बाईसवीं किस्त

मुनिधर्म के आवश्यकों का वर्णन :-- देववंदन - मुनिधर्म के आवश्यक-कर्त्तव्यों में समता या सामायिक, स्तव या स्तुति -- इन दो आवश्यकों का वर्णन…और पढ़ें


तेईसवीं किस्त

मुनिधर्म के आवश्यक-कर्त्तव्यों में 'समता' या 'सामायिक', 'स्तव' एवं 'वंदना' -- इन तीन का संक्षिप्त-विवरण प्रस्तुत किया जा चुका है |…और पढ़ें


चौबीसवीं किस्त

मुनिधर्म के आवश्यक-कर्त्तव्य, प्रतिक्रमण : भाग दो {कल प्रतिक्रमण के विषय में कुछ जानकारियाँ दी थीं | आज इसके विषय में कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदुओं की …और पढ़ें


पच्चीसवीं किस्त

मुनिधर्म के आवश्यक कर्त्तव्य, प्रत्याख्यान, मुनिधर्म के आवश्यक कर्त्तव्यों में समता/सामायिक, स्तव,वंदना एवं प्रतिक्रमण…और पढ़ें


छब्बीसवीं किस्त

मुनिधर्म के आवश्यक कर्त्तव्य, व्युत्सर्ग या कायोत्सर्ग, पिछली किस्तों में आपने मुनिधर्म के आवश्यक - कर्त्तव्यों में समता, स्तव, वंदना, प्रतिक्रमण एवं प्रत्याख्यान…और पढ़ें


सत्ताईसवीं किस्त

मुनिधर्म के आवश्यक कर्त्तव्य, अभी तक मैंने आवश्यकों का जितना वर्णन किया है, उस पर कई सुधी पाठकों की कई जिज्ञासायें आयीं हैं…और पढ़ें


अट्ठाईसवीं किस्त

मुनिधर्म के अन्य मूलगुण : अचेलकत्व, मुनिधर्म के आवश्यकों के संक्षिप्त-विवरण के बाद अब मुनिधर्म के अन्य शेष मूलगुणों के विषय में विवेचन क्रमप्राप्त है |…और पढ़ें


उन्तीसवीं किस्त

मुनिधर्म का मूलगुण : केशलोंच, मुनिदशा की साधना में यह एक महत्त्वपूर्ण मूलगुण है |स्वाधीनता, अपरिग्रह एवं जीवदया…और पढ़ें


तीसवीं किस्त

मुनिधर्म का मूलगुण : अदन्तधोवन, मुनिधर्म के मूलगुणों में आज 'अदन्तधोवन अर्थात् दाँत नहीं माँजना या दन्तमंजन नहीं करना' --पर चर्चा की जायेगी |…और पढ़ें


इकतीसवीं किस्त

मुनिधर्म का मूलगुण : अस्नानव्रत, मुनिधर्म के मूलगुणों में यह भी एक महत्त्वपूर्ण मूलगुण है | अदन्तधोवन मूलगुण की तरह यह भी वैज्ञानिक कारणों से कभी विवादग्रस्त न …और पढ़ें


बत्तीसवीं किस्त

मुनिधर्म का मूलगुण : भूशयन, आज की किस्त में मुनिधर्म के 'भूशयन' नामक मूलगुण की चर्चा की जायेगी | मुनिराज रात्रि के पिछले प्रहर में…और पढ़ें


तेतीसवीं किस्त

मुनिधर्म के मूलगुण : एकभुक्ति एवं स्थितिभुक्ति, आज मुनिधर्म के दो मूलगुणों की एकसाथ चर्चा की जायेगी, क्योंकि ये दोनों ही आहारचर्या…और पढ़ें


चौंतीसवीं किस्त

मुनिधर्म में चातुर्मास का स्वरूप एवं विधि, चातुर्मास की स्थापना का काल सन्निकट है | यह मुनिधर्म की अनिवार्य एवं महत्त्वपूर्ण-विधि है | अतः इस पर …और पढ़ें


पैंतीसवीं किस्त

मुनिधर्म के दस स्थितिकल्प, दिगम्बर जैन मुनिधर्म की साधना बहुत व्यापक और चंचल-चित्त लोगों के लिये असाध्यप्रायः है | इसके बारे …और पढ़ें


छत्तीसवीं किस्त

मुनिधर्म के विषय में कुछ विषयों का संक्षिप्त-विवरण प्रस्तुत करने के बाद आज से मुनिधर्म के उत्तरगुणों के बारे में संक्षिप्त-विवेचन प्रस्तुत करूँगा …और पढ़ें


सैंतीसवीं किस्त

जैनेतर-धर्मों में जहाँ व्यक्ति तपःसाधना विभिन्न-प्रकार की लौकिक-आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये करते हैं( कोई भी व्यक्ति को लें, उसने यदि तप किया…और पढ़ें


अड़तीसवीं किस्त

मुनिधर्म के उत्तरगुण : अंतरंग-तप {कल की किस्त में मुनिधर्म के उत्तरगुणों में तपों के अंतर्गत बाह्य-तपों के विषय में संक्षिप्त-विवरण प्रस्तुत किया था…और पढ़ें


उनतालीसवीं किस्त

मुनिधर्म में निषिद्ध-कार्य: दिगम्बर जैन मुनिधर्म का स्वरूप बहुत व्यापक है | इसकी पवित्रता की रक्षा के लिये बहुत सारी सावधानियाँ…और पढ़ें


चालीसवीं किस्त

मुनिधर्म की विहारचर्या: दिगम्बर जैन मुनिधर्म में विहारचर्या अपनेआप में बहुत विशिष्ट-क्रिया है | इसके संबंध में बहुआयामी-चिंतन जिनागम में…और पढ़ें


इकतालीसवीं किस्त

मुनिधर्म में निहारचर्या: दिगम्बर जैन मुनिधर्म में निहारचर्या का भी विवेक बहुत आवश्यक है | इस विवेक के बिना…और पढ़ें


बयालीसवीं किस्त

मुनिधर्म में दर्शनाचार: मुनिधर्म में पंचाचारों की चर्चा प्रमुखता से की जाती है | ये पंचाचार क्या हैं, कौन हैं और इनका…और पढ़ें


तेतालीसवीं किस्त

मुनिधर्म में ज्ञानाचार: मुनिधर्म में 'दर्शनाचार' के संक्षिप्त-विवरण के बाद आज…और पढ़ें


चवालीसवीं किस्त

निधर्म में चारित्राचार: मुनिधर्म के पंचाचारों में 'दर्शनाचार' एवं 'ज्ञानाचार' का संक्षेप में विवेचन प्रस्तुत हो चुका है | आज की…और पढ़ें


पैंतालीसवीं किस्त

मुनिधर्म में तपाचार: दर्शन-ज्ञान-चारित्राचार के वर्णन के उपरान्त तपाचार का वर्णन क्रमप्राप्त है | तप मुनिधर्म…और पढ़ें


छिसालीसवीं किस्त

मुनिधर्म में वीर्याचार: मुनिधर्म में पंचाचारों के अन्तर्गत तपाचार तक चार आचारों का संक्षिप्त-विवेचन प्रस्तुत किया जा चुका है | इस किस्त में वीर्याचार…और पढ़ें


सैंतालीसवीं किस्त

मुनिधर्म के आचार-विषयक ज्वलंत-प्रश्न: {इस क्रम में मेरा विवेच्य-विषय तो मुनिधर्म में सल्लेखना का है | किन्तु देशभर से विद्वानों, आगम के अभ्यासियों, वर्षों से…और पढ़ें


अड़तालीसवीं किस्त

मुनिधर्म में आचार-विषयक ज्वलंत-प्रश्न (2): पिछली किस्त के वर्ण्य-विषयों के क्रम में आगे के विचार-बिन्दु निम्नानुसार हैं…और पढ़ें


उनचासवीं किस्त

मुनिधर्म के आचार-विषयक ज्वलंत-प्रश्न (3): पिछली दो किस्तों में इस विषय के कुछ भी बिन्दुओं पर विवेचन प्रस्तुत किया गया है | आज …और पढ़ें


पचासवीं किस्त

मुनिधर्म के आचार-विषयक ज्वलंत-प्रश्न (4): पिछली किस्त में जितने प्रश्नों का विवेचन संभव हो सका था, उसके आगे क…और पढ़ें


इक्यावनवीं किस्त

मुनिधर्म के आचार-विषयक ज्वलंत-प्रश्न (5): इस प्रश्नोंवाली कड़ी की यह अभी अंतिम किस्त है (लेखमाला की अंतिम नहीं) | जितने प्रश्न…और पढ़ें


बावनवीं किस्त

मुनिधर्म में सल्लेखना: निर्ग्रंथ दिगम्बर जैन मुनिधर्म की गरिमा लोकोत्तर है | इसके साधक वह सब कर सकते हैं,…और पढ़ें


तिरेपनवीं किस्त

मुनिधर्म में सल्लेखना || (2): कल की किस्त में सल्लेखना के विषय में शब्द-केन्द्रित संक्षिप्त-परिचय दिया था | किन्तु…और पढ़ें


पचपनवीं किस्त

यद्यपि मैं सल्लेखना के विषय मैं अलग से पुस्तक लिखने की बात कह चुका हूँ,…और पढ़ें


छप्पनवीं किस्त

यह बहुत गम्भीरता से विचारणीय एवं मननीय विषय है |…और पढ़ें


(सत्तावनवीं किस्त)

7. उपनीति-क्रिया :-- पुराने सभी संबंधों को, जो मिथ्यात्व की दशा के प्रतीक रहे हैं,…और पढ़ें


(अट्ठावनवीं किस्त)

मुनिदीक्षा की असली-पात्रता तो अंतरंग से हिलोरें मारती हुई वह 'वैराग्यवृत्ति' है,…और पढ़ें


(उनसठवीं किस्त)

यह विषय यद्यपि भावपक्ष की दृष्टि से मैं संक्षेप में विवेचित कर चुका हूँ।…और पढ़ें


(साठवीं किस्त)

11. पिछली किस्त में बतायी गयी विधि के बाद आचार्य भगवन्त नवदीक्षार्थी को 'व्रतदान-क्रिया' सम्पन्न करते हैं।…और पढ़ें


(इकसठवीं किस्त)

इस 'व्रतदान-क्रिया' को अनुष्ठित करते समय आचार्य भगवन्त निम्नलिखित गाथासूत्र को पढ़कर नवदीक्षित-मुनि को उसका अभिप्राय सविस्तार समझाते हैं :--…और पढ़ें

प्रोफ़ेसर सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली