हिंदी कविताएं

।। तो अनपढ़ तुम हो..।।

होती होंगी जमाने भर की ,
डिग्रीयाँ तुम्हारे पास......।
छलकते लफ्ज़ भावों के.    
न पढ़ पाये , तो अनपढ़ तुम हो ।।1।।

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।। धुले हों भाव भक्तों के ।।

धुले हों भाव  भक्तों के,
 भक्ति  हर पाप  धोती है।
मन हो  सीप-गुणग्राही,  
तो हर परिणाम  मोती है।।

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।। पछुआ-हवा लग गयी लोगों को ।।

पूरब में रहने वालों को ,
संस्कार  जीने वालों को।
समतारस पीने वालों को,
ठंडा कर खाने** वालों को।।

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जिनाम्नाय में लग गये हैं घुन

अरे ओ! पानी छान-छानकर पीने वालो!
अरे ओ! अनाज शोध-बीनकर खाने वालो!!
अरे ओ! धर्मध्यान के जागरुक- रखवालो!
अरे ओ! सामाजिक-चेतना के सजग-पहरेदारो !!
मत बजाओ तुम अपनी डफली औ' अपनी धुन,
पहिचानो, कैसे जिनाम्नाय में लग गये हैं घुन।।1।।

"दंसणमूलो धम्मो" कहकर आचार्यों ने कहा,
कि जैनो! श्रद्धा को तुम जल से पहले छानो।
वीतरागी-देव औ' विरागी-गुरू के अलावा,

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अस्मिता खो चुकी है

आधुनिक-विकासवाद की,
अद्भुत यह भेंट मिली है।
प्लास्टिक के गमले में,
'कागज़ की कली' खिली है।।1।। 

कुदरती-सुगंध तो अब,
किस्सा ही बन चुकी है।
नकली-खुशबुओं की,
फैक्ट्रियाँ चल रहीं हैं।।2।।

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उनने क्या किया? इनने क्या दिया?

वे मंदिरों में भगवान् बिठाते ही रह गए,
ये घट-घट में भगवान् बिठाते चले गए ||
वे पुजारियों की फ़ौज बनाते ही रह गए,
ये पूज्य बनने की कला को सिखा गए || 1 || 

जिनवाणी को वे मंदिरों में सजाते ही रह गए,
ये जन-जन को 'समयसार' सिखाकर चले गए |
वे मोक्षमार्ग की विधि बताते ही रह गए,
ये भक्त को "भगवान्" बताकर चले गए || 2 ||

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क्षमावणी-पर्व : परम्परा या प्रासंगिकता

भारत जैसे धार्मिक-निष्ठा-प्रधान देश में हर धर्म के
कुछ ऐसे पर्व होते हैं, जिनमें अपनी श्रद्धा एवं
विवेक के अनुसार धार्मिक-अनुष्ठान आयोजित होते हैं |

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फिर भी जन्म-दिवस-आकर्षण?

अरे! अजन्मे तुम हो चेतन!
फिर भी जन्म-दिवस आकर्षण? 
भव-वन-अटन में कलंक जो,   
उसी कृत्य पर गौरव-वंदन?||1||

भव का अन्त कृते यह जीवन | 
  क्षणिक सकल यह पर्यय-दर्शन || 
पर को जन्म 'दोष' बतलाते |    
  स्वयं उसी पर क्यों इतराते?||2|| 

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आध्यात्मिक सत्पुरुष श्री कानजीस्वामी से प्राप्त तत्त्वज्ञान की दिशा और पं. टोडरमल स्मारक

मैंने जिस परिवार में यह नरदेह ग्रहण की,
वहाँ मेरे इस जन्म से भी 14 वर्ष पहले से
पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी के द्वारा प्रदत्त
आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान की गूँज सुबह 5 बजे
से लेकर रात्रि 10 बजे तक किसी न किसी रूप में गूँजती रहती थी |

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।। धर्म को नीलाम होते देखा।।

नैतिक और आध्यात्मिक-मूल्यों की,
पराकाष्ठा जिसमें निहित है।
धर्म और विज्ञान की दृष्टि,
जिसकी और सभी से उत्कृष्ट है।।

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।। रूह-ब-रूह ।।

उर्दू का एक प्रचलित शब्द है
"रू-ब-रू",
जो कि 'आमने-सामने' के अर्थ में
लोक-प्रचलित है।

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प्रोफ़ेसर सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली