आचार्य कुन्दकुन्द का विदेहगमन

लेखक -- प्रो. सुदीप कुमार जैन ,नई दिल्ली

कुछ वर्षों पूर्व जैनसमाज की एक प्रतिष्ठित शोधपत्रिका में कुछ लेख प्रकाशित कर एक बुजुर्ग विद्वान् ने चुनौती दी, कि "आचार्य कुन्दकुन्द का विदेहगमन काल्पनिक कहानी है, सत्य और तथ्य नहीं है |
१. यदि वे गये होते, तो उन्होंने अपने किसी ग्रंथ में इसका उल्लेख किया होता | 
२. जिन कहानियों में इस बात का उल्लेख मिलता है ,वे कुन्दकुन्दाम्नाय के ग्रंथ ही नहीं हैं; क्योंकि उनमें रागी देवी-देवताओं का महिमामंडन है, जो कि कुन्दकुन्दाम्नाय में कदापि संभव नहीं है |

३. जिन आचार्य देवसेन के ग्रंथ में 'जदि पउमणंदि-णाहो सीमंधरसामि...' कहकर चारण-रिद्धि द्वारा विदेहगमन करके सीमंधरस्वामी के दर्शन करने की बात कह रहे हैं, तो पंचमकाल में मुनियों के रिद्धियाँ होतीं ही नहीं हैं; तब इस कथन की प्रामाणिकता क्या रह जाती है? "

तब मेरे पास इन बातों का कोई ठोस उत्तर नहीं था, किन्तु यह दृढ-श्रद्धान था कि कुन्दकुन्दाचार्य का विदेहगमन काल्पनिक नहीं है, सत्य है | किन्तु विद्वानों के बीच में प्रस्तुत करने के लिये तथ्य और प्रमाण अपेक्षित होते हैं, मात्र श्रद्धान को वैयक्तिक संपत्ति तो माना जा सकता है; पर सर्वसम्मति के लिये साक्ष्य चाहिये होते हैं | उन अकाट्य-प्रमाणों  के अन्वेषण में समर्पित होकर लगा रहा, परंतु तब तक कोई  ज्वलंत-प्रमाण मुझे नहीं मिल सके थे | मैंने व्यक्तिगतरूप से उन विद्वद्वर्य से मिलकर कहा " पं. जी सा.! यद्यपि अभी कोई इतना प्रबल-प्रमाण मेरे पास नहीं है, तथापि मेरा दृढ-विश्वास है कि एक दिन मैं सप्रमाण सिद्ध कर सकूँगा कि आचार्य कुन्दकुन्द विदेहक्षेत्र गये थे, वहाँ ७ दिनों तक सीमंधर स्वामी की साक्षात् दिव्यध्वनि सुनी थी |"

उन्होंने प्रीतिपूर्वक कहा कि "बेटे! मुझे खुशी होगी यदि तुम ऐसा कर सकोगे | कुन्दकुन्दाचार्य का मैं भी अनन्य-भक्त हूँ | पर ऐसे प्रमाण मत देना, जो कुन्दकुन्दाचार्य की आम्नाय में ही स्वीकार्य न हों|" 

मैंने उन्हें इसका वचन दिया कि " मेरे प्रमाण कुन्दकुन्दाम्नाय के अनुरूप ही होंगे, और यदि संभव हो सका तो स्वयं कुन्दकुन्दाचार्य के द्वारा ही इस तथ्य की पुष्टि कराऊँगा |"

उनके जीते जी तो यह कार्य संभव नहीं हो सका, क्योंकि क्रमबद्ध में ऐसा ही था | पर प्रवचनसार जी ग्रंथराज के स्वाध्याय के क्रम में मंगलाचरण के अर्थ के क्रम में कुछ ऐसा अद्भुत घटित हुआ, कि मानो चमत्कार ही हो गया, और लगा कि स्वयं कुन्दकुन्दाचार्य देव ही मानो स्वयं साक्षी दे रहे हों कि " हाँ! मैं विदेहक्षेत्र गया था और वहाँ मैंने साक्षात् सीमंधर-परमात्मा के दर्शन किये और दिव्यध्वनि भी सुनी |"

और इसका साक्षी बनीं इस ग्रंथराज की प्रारंभ की पाँच मंगलाचरण-गाथायें | 

वह मर्म आपके समक्ष मैं यहाँ तथ्यात्मकरूप से प्रस्तुत कर रहा हूँ |

प्रथमतः मैं मंगलाचरण की वे पाँच गाथायें व उनका सरल शब्दार्थ लिख रहा हूँ | फिर उन विशेष-बिन्दुओं का उल्लेख करूँगा, जिनसे उपर्युक्त-बात प्रमाणित होगी |

एस सुरासुर-मणुसिंद-वंदिदं,
धोद-घादि-कम्ममलं |
पणमामि वड्ढमाणं,
तित्थं धम्मस्स कत्तारं ||१||

अर्थ:-- एस=यह, सुर=देवगणों के, असुर = असुरगणों के, मणुसिंद= मनुष्यों के इंद्रों के द्वारा, वंदिदं= वंदित, धोद-घादि-कम्ममलं=धो डाला है घातिकर्मरूपी मल को जिन्होंने, धम्मस्स तित्थं= धर्म के तीर्थ को, कत्तारं= करनेवाले, वड्ढमाणं= वर्द्धमान को, पणमामि= नमस्कार करता हूँ |

सेसे पुण तित्थयरे, 
ससव्वसिद्धे विसुद्ध-सब्भावे |
समणे य णाण-दंसण-
चरित्त-तव-वीरियायारे ||२||
अर्थ:-- पुण= और, सेसे= शेष, तित्थयरे=तीर्थंकरों को, विसुद्धसब्भावे=विशुद्ध- स्वभाववाले, ससव्वसिद्धे= सभी सिद्धों सहित,  णाण-दंसण-चरित्त-तव-वीरियायारे= ज्ञानाचार-दर्शनाचार-चारित्राचार-तपाचार-वीर्याचार वाले,

समणे= श्रमणों को (पणमामि=प्रणाम करता हूँ).

ते ते सव्वे समगं समगं ,
पत्तेगमेव पत्तेगं |
वंदामि य वट्टंते,
अरहंते माणुसे खेत्ते || ३ ||

अर्थ:-- ते ते सव्वे= उन सभी को, समगं समगं= समग्र समग्र रूप से, य= और , पत्तेगमेव पत्तेगं = पृथक् पृथक् रूप से, वंदामि= वंदना करता हूँ | य= और , माणुसे खेत्ते= मनुष्यक्षेत्र में( अढ़ाईद्वीप में) , वट्टंते= वर्तमान, अरहंते= अरहंतों को, वंदामि=वंदन करता हूँ |

किच्चा अरहंताणं, 
सिद्धाणं तह णमो गणहराणं |
अज्झावयवग्गाणं,
साहूणं चेव सव्वेसिं || ४||

अर्थ:-- सव्वेसिं= सभी, अरहंताणं= अरहंतों को, सिद्धाणं= सिद्धों को, तह = तथा, गणहराणं= गणधरों को, अज्झावयवग्गाणं= अध्यापकवर्ग को, चेव= और, साहूणं= साधुओं को, णमो = नमस्कार, किच्चा= करके ....|

तेसिं विसुद्ध-दंसण-णाण-
पहाणासमं समासेज्ज |
उवसंपयामि सम्मं,
जत्तो णिव्वाण-संपत्ती || ५ ||

अर्थ:-- तेसिं= उनके, विसुद्ध-दंसण-णाण-पहाणासमं= विशुद्ध दर्शन- ज्ञान-प्रधान आश्रम को, समासेज्ज= प्राप्त करके, सम्मं= साम्यभाव को, उवसंपयामि= प्राप्त होता हूँ, जत्तो= जिससे, णिव्वाण-संपत्ती= निर्वाण की प्राप्ति होती है |

---यह तो सामान्य शब्दार्थ हुआ | अब मैं कुछ वे जिज्ञासायें प्रस्तुत करूँगा, जिनके समाधानों से कुन्दकुन्दाचार्य देव का विदेहगमन उन्हीं के द्वारा प्रमाणित होगा |

पहला बिंदु है ग्रंथ का नामकरण | 'प्रवचन' शब्द का मूल-अर्थ है 'दिव्यध्वनि' |  अर्थात् जिस ग्रंथ में तीर्थंकर-परमात्मा की दिव्यध्वनि को साक्षात् सुनकर उसका सार संग्रहीत किया गया हो, उस ग्रंथ को ही 'प्रवचनसार' कहा जाना सार्थक है | इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये ही सोद्देश्यरूप से उन्होंने इस ग्रंथ का नामकरण ' पवयणसारो' या 'प्रवचनसार' रखा है | इस नामकरण से उन्होंने स्पष्ट संकेत किया है कि इस ग्रंथ में उन्होंने पूर्वी- विदेह क्षेत्र में विद्यमान सीमंधर स्वामी की दिव्यध्वनि सुनकर भरतक्षेत्र वापस आकर उसका सार इस ग्रंथ में निबद्ध किया है |

इससे यह भी स्पष्ट संकेत है कि उनके शेष ग्रंथ उनके विदेहगमन से पूर्व- रचित प्रतीत होते हैं | क्योंकि उनकी प्रतिपादनशैली व इस ग्रंथ की शैली में अंतर है | --- इस तथ्य को मैं अपने अलग लेख में सिद्ध करूँगा |

१.मेरी प्रथम-जिज्ञासा  मंगलाचरण की पहली गाथा का पहला शब्द ' एस' है | इसका सामान्य-अर्थ है ' यह' | इसका अर्थ 'एस अहं' = यह मैं --- इसप्रकार किया जाता है | किंतु यह मात्र खानापूर्ति का अर्थ प्रतीत होता है, इससे 'यह' पद के प्रयोग की कोई सार्थकता सिद्ध नहीं होती है |

मेरे विचार से यह शब्द कुन्दकुन्दाचार्य के सीमंधर स्वामी के समवसरण से वापस भरतक्षेत्र लौटने के बाद भी सीमंधर स्वामी की प्रशांत-छवि उनकी नज़रों में मानो स्पष्ट झलक रही थी, जिसे उन्होंने 'यह' पद के प्रयोग से सजीव किया है |

( ध्यातव्य है कि आध्यात्मिक सत्पुरुष श्री कानजी स्वामी भी सीमंधर स्वामी का स्मरण इसीप्रकार " आ भगवान् विदेहक्षेत्र मां  विराजे छे, पाँचसौ धनुष नी काया छे, कोटि पूर्व नी आयु छे, जंगलों से बड़ा बड़ा केसरी सिंहो आवे छे अने भगवान् ना सामे विनीतभाव थी बैठे छे |") लगभग ऐसा ही जीवंत-वर्णन कुन्दकुन्दाचार्य देव ने भी इस मंगलाचरण में प्रस्तुत किया है |और इसी सजीवता को व्यक्त करने के लिये उन्होंने सबसे पहले 'एस' पद का प्रयोग कियाहै-- ऐसी मेरी मान्यता है.

२.'सुरासुर-मणुसिंद-वंदिदं'--- यह वाक्यांश भी समवसरण के साक्षात् दृश्य को प्रस्तुत करता है. मानो कुन्दकुन्दाचार्य के समक्ष ही सौ इन्द्र तीर्थंकर-परमात्मा को भावपूर्ण-वंदन कर रहे हैं.

यह कथन उन गृहीत-मिथ्यात्व के पोषक , क्षुद्र-रागी देवी-देवताओं की वंदना करने वाले व्यक्तियों को बड़ा संदेश है कि जिन पद्मावती-धरणेन्द्र-क्षेत्रपाल आदि देवों की सांसारिक भोगों की कामना से तुम वंदना करते हो, वे तो भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी श्रेणी के सामान्यदेव हैं, जिनमें सम्यग्दृष्टि-जीव कभी जन्म ही नहीं लेता है. जन्म से ये गारंटी से मिथ्यादृष्टि ही होते हैं. उनमें भी वे इंद्र-सामानिक आदि श्रेष्ठ पदों के धारी भी नहीं होते हैं,अत्यन्त सामान्यश्रेणी के देव होते हैं;उनकी तो तुम वंदना करने जाते हो . पर इनके भी स्वामी इंद्रादिक सविनय जिनकी वंदना करते हैं, उनकी वैसी भावपूर्ण वंदना नहीं करते हो. यह संसारी मनुष्यों का कैसा घोर-अविवेक है? समझदार व्यक्ति को तो इतना संकेत ही बहुत है कि इन देवों के इंद्र भी जिन वीतरागी परमात्मा के चरणों में सविनय वंदन करते हैं, तुम्हें भी उन्हीं की वंदना करना चाहिये. क्योंकि यह दुर्लभ मनुष्य भव, जैनकुल और जिनवाणी मिथ्यात्व का नाश करने के साधन मिले हैं. इन्हें यदि तुम नये गृहीत-मिथ्सात्व के पोषण का साधन बनाओगे, तो इससे अधिक खेद व दुर्भाग्य की बात कोई हो ही नहीं सकती है|

यहाँ यह कथन इस तथ्य का प्रतीकात्मक-समर्थक तो है  ही, समवसरण की जीवंत-प्रस्तुति प्रमुखता से व्यक्त करता है.इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कुन्दकुन्दाचार्य प्रवचनसार ग्रंथ में मंगलाचरण में जिनकी वंदना कर रहे हैं, वह साक्षात् समवसरण में विराजमान तीर्थंकर-परमात्मा की है. आलंकारिक वर्णन नहीं है, बल्कि जीवंत और वास्तविक है|

३. धोद-घादिकम्ममलं---वाक्यांश भी अरहंत परमात्मा का वाचक है, सिद्ध का नहीं. ध्यातव्य है कि महावीर स्वामी सिद्ध हो चुके हैं, सर्वकर्म-बंधनों से मुक्त हो चुके हैं . जबकि सीमंधर स्वामी अभी भी अरहंत-अवस्था में ही विद्यमान हैं, उनके चार घातिकर्म ही नष्ट हुये हैं, अघातिकर्म अभी शेष हबातअतः यह कथन सीमंधर स्वामी पर सटीक ढंग से लागू होता है, महावीर स्वामी पर नहीं.

४. धम्मस्स तित्थं कत्तारं = धर्मतीर्थ के कर्त्ता को.
महावीर स्वामी धर्मतीर्थ के प्रवर्तक हुये हैं, और उनका शासन अभी भी भरतक्षेत्र में प्रवर्तमान है. किंतु अभी उनका धर्मोपदेश नहीं हो रहा है, क्योंकि वे सिद्ध हो चुके हैं. जबकि'सीमंधर-पूजन' में हम पढ़ते हैं कि " पूरब-विदेह में हे प्रभुवर! हो आप आज भी विद्यमान | हो रहा दिव्य-उपदेश भव्य पा रहे नित्य अध्यात्मज्ञान ||" और भी " श्री कुन्दकुन्दाचार्य देव को मिला आपसे दिव्यज्ञान |"

सीमंधर स्वामी विहरमान-तीर्थंकर हैं, उनकी प्रतिदिन तीन बार दिव्यध्वनि होती ही होती है. वही कुन्दकुन्दाचार्य देव ने भी साक्षात् सुनी थी. और इसी बात का स्पष्ट संकेत इस वाक्यांश के द्वारा उन्होंने यहाँ दिया है.

५.वड्ढमाणं = वर्द्धमान को, पणमामि= प्रणाम करता हूँ. 
यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ तो वर्द्धमान को नमस्कार किया गया है. और यह महावीर स्वामी का एक नाम है. अन्य आचार्यों ने भी "नमः श्री-वर्द्धमानाय" जैसे कथनों से महावीर स्वामी को ही नमस्कार किया है. तो यहाँ सीमंधर स्वामी की संभावना क्यों की जाये? 
इसका एक उत्तर यह है कि यदि वर्द्धमान के स्थान पर 'महावीरं' पद का प्रयोग होता , तो भी कोई मात्रा आदि का दोष नहीं आ रहा था. अतः स्पष्ट महावीर ही लिख देते, वर्द्धमान ही क्यों लिखा? और जब पहले लिखे कोई भी विशेषण जब महावीर स्वामी के साथ सीधे घटित नहीं हो रहे हैं (न तो महावीर स्वामी के मात्र घातियाकर्म नष्ट हुये हैं, न ही उनके पास अब सौ इंद्र वंदन करने आते हैं,न ही उनके द्वारा अब धर्मतीर्थ का प्रवर्तन हो रहा है ), जबकि सीमंधर स्वामी के साथ ये सारे विशेषण एकदम सटीक घटित हो रहे हैं.  
तो प्रश्न है कि वड्ढमाणं का अर्थ सीमंधर कैसे लिया जा सकता है? साहित्यशास्त्र में एक 'श्लेष अलंकार' का कथन आता है, जिसमें एक ही शब्द के अलग अर्थ किये जाते हैं और वे सटीक भी माने जाते हैं. यदि 'वर्द्धमान' का शाब्दिक-अर्थ 'बढ़ते हुये' लिया जाये, तो महावीर स्वामी के साथ यह घटित नहीं होगा, क्योंकि वे परिपूर्ण सिद्ध- दशा को प्राप्त हो चुके हैं; जबकि सीमंधर स्वामी अभी अरहंत हैं, और सिद्ध-दशा की ओर वर्द्धमान हैं. 
यहाँ यह बात मान भी ली जाये, तो भी यह प्रश्न बना रहता है कि "यदि कुन्दकुन्दाचार्य देव को सीमंधर स्वामी को ही नमस्कार मंगलाचरण में करना था, तो सीधे उनके नाम से ही क्यों नहीं कर दिया. श्लेष का प्रयोग करने की क्या आवश्यकता थी. कोई ऐसी बात तो है नहीं कि सीमंधर हमारी परंपरा में मान्य नहीं हैं या उनकी वंदना मंगलाचरण में नहीं की जा सकती है? 

इसका उत्तर निम्नानुसार है:--

भरतक्षेत्र में दीक्षा लेने वाले मुनिराज यहीं की वर्तमान चौबीसी के तीर्थंकर-परमात्मा की ही मंगलाचरण में वंदना करते हैं. यह शासन की मर्यादा है. सामान्य पंचपरमेष्ठी आदि पदों या वीतरागता आदि गुणों की वंदना रूप मंगलाचरण कर सकते हैं, किन्तु अन्य क्षेत्र के तीर्थंकर को नहीं. संभवतः इसीलिये यह प्रयोग कुन्दकुन्दाचार्य देव ने किया है. पंचकल्याणकों में भी यही मर्यादा है. यज्ञनायक और मूलनायक यहाँ भरतक्षेत्र के तीर्थंकर ही होंगे, अन्यक्षेत्र के तीर्थंकर की प्रतिमा उसमें प्रतिष्ठित हो सकती है, किन्तु वे मूलनायक आदि नहीं बनाये जा सकते हैं. यही मर्यादा दीक्षाविधि में भी लागू होती है|

यहाँ एक और तथ्य मननीय है, वह यह कि कुन्दकुन्दाचार्य देव ने अपने ग्रंथों में एक गाथा में ही मंगलाचरण किया है, जबकि प्रवचनसार में पाँच गाथाओं में मंगलाचरण हुआ है. ऐसा क्यों किया? ----यह बात  सामान्य नहीं है. क्या वे कुछ और कहना चाहते थे, जो एक गाथा में कहकर भी संतुष्ट नहीं थे? 

हाँ, संभवतः यही सत्य है.

१.अन्यथा अगली ही गाथा में " सेसे पुण तित्थयरे..." से बात शुरू नहीं करनी पड़ती. क्योंकि यहाँ 'शेष तीर्थंकर ' शब्द से भरतक्षेत्र के शेष तीर्थंकर विवक्षित प्रतीत नहीं होते हैं. अपितु बीस विहरमान तीर्थंकरों में से एक सीमंधर स्वामी के दर्शन तो उन्होंने साक्षात् कर लिये थे, किन्तु शेष १९ तीर्थंकरों के दर्शन किये बिना ही वे वापस लौट रहे थे| एक समर्पित जिनभक्त के लिये यह सुखद बात तो नहीं थी, परंतु सात दिन निर्जल-निराहार हो चुके थे. और जिन जिज्ञासाओं के शमन के लिये वे विदेहक्षेत्र गये थे, उनका समाधान तो सीमंधर स्वामी की सन्निधि में हो ही गया था,शेष १९ तीर्थंकरों की वंदना करने का ही भाव था; अतः उन सभी की भाववंदना करने के लिये " और शेष सभी तीर्थंकरों की वंदना करता हूँ "-यह वाक्यांश प्रयोग किया है-- यह बात प्रभावी प्रतीत होती है. भरतक्षेत्र के तीर्थंकरों में किसी एक का नाम लेकर वंदना करने एवं बाकी सबकी इसप्रकार वंदना करने का प्रयोग न तो मैंने किसी प्राचीन आचार्य के मंगलाचरण में देखा है, और न ही उनमें ऐसे प्रयोग का कोई औचित्य है. 

२. ससव्वसिद्धे= सभी सिद्धों के साथ | किंतु इस वाक्यांश की इस प्रकरण में संगति प्रतीत नहीं होती है | इसके साथ एक विशेषण-पद भी है " विसुद्ध-सब्भावे =विशुद्ध-सद्भाववाले |  सब्भाव शब्द का अर्थ स्वभाव भी हो सकता है, किंतु यहाँ पर यह सद्भाववाची ही है| प्राकृत में सामान्यतः 'स्वभाव' के लिये 'सहाव' प्रचलित है, और 'सद्भाव' के लिये 'सब्भाव' | सिद्धों को विशुद्ध- सद्भाव वाला कहना कहीं न कहीं कुछ खास संकेत है | सभी सिद्ध विशुद्धस्वभावी तो होते ही हैं, फिर यहाँ सद्भाववाले क्यों कहा?

मेरे अभिप्राय से सीमंधर स्वामी के समवसरण में आचार्य कुन्दकुन्द के समक्ष ही कोई भव्य सिद्धत्व को प्राप्त हुये होंगे, उनका वह विशुद्ध-सद्भाव आचार्यदेव ने साक्षात् देखा होगा और पंचमकाल में जन्म लेकर भी चतुर्थकाल की सर्वोत्कृष्ट सिद्धि के प्रत्यक्ष साक्षी बनने से उन्होंने इसका विशेष उल्लेख किया | सिद्धत्व के सद्भाव के साक्षी और वह भी पंचमकाल में जन्म लेने वाला जीव!!!! अपार सौभाग्य था कुन्दकुन्दाचार्य देव का. जीवन्मुक्त अरहंत-परमात्मा के दर्शन करने गये थे और सिद्ध होते जीव के सद्भाव के साक्षी बन गये. एक सिद्ध के साक्षी बनकर भी सभी सिद्धों को जाना जा सकता है, क्योंकि सिद्धों में कोई भेद नहीं होता है. जो प्रत्यक्ष देखा, उसका उल्लेख न आये,-- यह कैसे संभव था?  अतः सिद्धों के सद्भाव का वर्णन किया, स्वभाव का नहीं. (यहाँ सब्भाव शब्द का अर्थ सद्भाव है-- यह अमृतचंद्राचार्य ने भी अपनी टीका में स्वीकार किया है |

३. णाण-दंसण-चरित्त-तव-वीरियायारे समणे = ज्ञानाचार-दर्शनाचार-चारित्राचार-तपाचार-वीर्याचार वाले श्रमणों को | 
ऐसे उत्कृष्ट और निरतिचार पंचाचार के साधक श्रमण तीर्थंकर परमात्मा के समवसरण में सहज ही उपलब्ध होते हैं | विशेषतः वीर्याचार के समर्थ साधक तो पंचमकाल में यहाँ दुर्लभ ही थे | ( जिन्हें इस विषय में जानकारी न हो, वे अलग से इसकी जानकारी ले सकते हैं | ) इसीलिये उन्होंने इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया है |

अर्थात् पाँचों परमेष्ठियों के सर्वोत्कृष्ट स्वरूप के प्रत्यक्ष साक्षी वे बने थे---इस तथ्य की स्पष्ट स्वीकृति इस दूसरी गाथा में मिल रही है | 
यह सुसंयोग भरतक्षेत्र में तो पंचमकाल में कुन्दकुन्दाचार्य देव को उपलब्ध था नहीं, अतः स्पष्ट है कि अत्यन्त संयत-शब्दों में इनके माध्यम से उन्होंने अपनी विदेहक्षेत्र की यात्रा की पुष्टि की है | और वहाँ का जीवंत रूप भी प्रस्तुत किया है |

मंगलाचरण की तीसरी गाथा में समवसरण में समवेत पाँचों परमेष्ठी का बहुमान करने के उपरांत उनकी वंदना करने की अद्भुत-प्रविधि का मनोहारी वर्णन इस गाथा में प्रस्तुत किया है |
देखिये, इस बारे में बिन्दुशः विवेचन इसप्रकार है-
१. ते ते सव्वे समगं समगं वंदामि= उन सभी को मैं समग्ररूप से वंदन करता हूँ |

क्या आप समग्र-वंदना का भाव व विधि जानते हैं? हम जैसे देव-शास्त्र-गुरु की पूजा, सिद्ध पूजा, अकृत्रिम-जिनालय पूजा आदि करते हैं, इनमें व्यक्ति की प्रमुखता नहीं होती है, बल्कि गुणों की प्रमुखता होती है | कौन से नामवाले देव की या शास्त्र की या गुरु की या सिद्ध की या किसके बिंब की पूजन करनी है-- यह प्रश्न ही नहीं होता | बस उनके गुण ही चित्तपटल पर उभरते हैं और उन्हीं के बहुमान में भरकर हम उनका भावपूर्वक गुणानुवाद करते हैं | इस प्रक्रिया में व्यक्ति की प्रमुखता न होकर गुणों के माध्यम से अनंत की वंदना व बहुमान हो जाता है | 

२. पत्तेगमेव पत्तेगं वंदामि = प्रत्येक की पृथक् पृथक् रूप से वंदना करता हूँ |

इसका भी मौलिक महत्त्व है | किसी भी मंदिर, पंचकल्याणक आदि के आयोजन में व्यक्तिगत अर्चना की महत्ता होती है | जैसे कि आदिनाथ पंचकल्याणक, महावीर दि. जिनमंदिर  आदि |  इसमें उनकी साधना-पद्धति एवं जीवन के प्रसंग हमें प्रेरणास्रोत बनकर हृदय को शाश्वत-जीवनमूल्यों एवं संस्कारों के प्रति आकर्षित करते हैं | 

ऐसे प्रसंग हमारे जीवन में बारंबार बनते हैं, जब हम इन दोनों प्रकार के वंदनाक्रम को अपनाते हैं | प्रथमानुयोग के ग्रंथ प्रत्येक/व्यक्ति-आधारित होते हैं; जबकि शेष अनुयोगों में समग्रता या समूह-भावना वर्णन की आधार होती है | उनमें वैयक्तिकता का कोई महत्त्व नहीं होता है | पूजनविधि में अनिवार्य देव-शास्त्र-गुरु-पूजन समग्रतापरक , विशुद्ध गुणों पर आधारित होती है, तो वहीं मूलनायक तीर्थंकर की पूजन की अनिवायता हमें व्यक्तिपरकता या प्रत्येकता की महत्ता बताती है | यह हम प्रतिदिन करते हैं | 

कुन्दकुन्दाचार्य देव को भी साक्षात् आराध्य बने सीमंधर स्वामी की प्रत्येकता, एवं दृष्ट-अदृष्टशेष सभी तीर्थंकरों व परमेष्ठियों की समग्र-वंदना अपनी सार्थकता प्रमाणित करती है | 
कुन्दकुन्दाचार्य की यह समग्र या प्रत्येक वंदना भी

विदेहक्षेत्र तथा उससे भी आगे जाकर संपूर्ण ढाई द्वीप के तीर्थंकरों को समर्पित हो जाती है | तभी तो उन्होंने लिखा कि " वंदामि य वट्टंते अरहंते माणुसे खेत्ते " अर्थात् मनुष्यक्षेत्र में विहरमान अरहंतों की मैं वंदना करता हूँ | 

चूँकि सदा विहरमान-अरहंत सिर्फ विदेहक्षेत्र में ही होते हैं |और कुन्दकुन्दाचार्य देव के समय में बीस तीर्थंकर ही विहरमान थे, जिनमें से सीमंधर स्वामी के दर्शन उन्हें मिल गये थे, शेष उन्नीस तीर्थंकरों के वंदन का भाव उन्हें होना स्वाभाविक है | हम यदि सम्मेदशिखर जी जाकर किसी कारणवश मात्र स्वर्णभद्रकूट के ही दर्शन कर पा रहे हों, तो क्या वहाँ खड़े होकर शेष कूटों की समग्र वंदना व प्रत्येक वंदना करने का भाव नहीं उमड़ेगा? अवश्य होगा. वही भाव कुन्दकुन्दाचार्य देव ने सीमंधर स्वामी के दर्शन करने के बाद शेष उन्नीस तीर्थंकरों की वंदनार्थ यहाँ व्यक्त किया है |

एक बात और भी है | वह यह कि कुन्दकुन्दाचार्य देव के मन में यह भी व्यक्त करने का प्रबल भाव था कि वे यह सब कथन सीमंधर स्वामी की वंदना करने की अभिव्यक्ति के लिये कर रहे थे | तो कोई यह अर्थ न लगा ले कि "सेसे तित्थयरे" का अर्थ भरतक्षेत्र के शेष तेईस तीर्थंकर हैं | अतः स्पष्ट किया कि वे मनुष्यक्षेत्र के विहरमान शेष तीर्थंकरों की वंदना कर रहे हैं, न कि भरतक्षेत्र के | 

इसके पीछे दीक्षागत विवशता स्पष्ट कथन ( कि वे सीमंधर स्वामी की वंदना कर रहे हैं)  करने में बाधक थी, तो कथन का विस्तार करके उन्होंने मर्यादा की रक्षा भी कर ली और अपना भाव भी स्पष्ट रूप से संकेतित कर दिया. उनके शब्द मर्यादा के बंधन में थे, किंतु उनके भाव उन्मुक्त थे. संकेत में कहना उनकी विवशता थी, अतः शब्द और भाव--दोनों का सामंजस्य करने में मंगलाचरण की गाथायें बढ़ गयीं.    

यह बात यहीं पूरी नहीं हुई, कुन्दकुन्दाचार्य देव को इतने में तसल्ली नहीं हुई कि इतने मात्र से पाठक उनके भाव को समझ पायेंगे कि वे सीमंधर स्वामी की वंदना कर रहे हैं, अतः वे अपने भाव को स्पष्ट करने के लिये प्रकारांतर से कथन अगली गाथा में करते हैं|

मंगलाचरण की चौथी गाथा में कुन्दकुन्दाचार्य देव ऊपरी तौर पर तो पंच-परमेष्ठियों को वंदन कर रहे हैं, परन्तु उनका स्पष्ट संकेत समवसरण के लिये है | इसे समझने के लिये मूल गाथा को पुनः देखना होगा |
"किच्चा अरिहंताणं, 
सिद्धाणं तह णमो गणहराणं |
अज्झावयवग्गाणं,

साहूणं चेव सव्वेसिं ||"

इसका अर्थ तो ऊपर दे चुका हूँ | अतः मात्र महत्त्वपूर्ण बिंदुओं का विवेचन यहाँ दे रहा हूँ |

१. णमो किच्चा = नमस्कार करके. परोक्ष स्थिति में नमस्कार प्रायः कहा जाता है, और प्रत्यक्ष दशा में नमस्कार कहने की नहीं, अपितु करने की चीज़ होती है | यद्यपि परोक्षदशा में भी भाव-नमस्कार

किया जा सकता है, किन्तु प्रत्यक्ष रूप में तो द्रव्य और भाव-- दोनों रूपों में किया ही जाता है | इस स्थिति में विधि प्रमुख हो जाती है, विनय प्रधान हो जाती है और शब्द गौण रह जाते हैं |

इस कथन से यह पुष्ट होता है कि कुन्दकुन्दाचार्य देव ने प्रत्यक्ष वंदना की थी, न कि परोक्ष |

२. णमो गणहराणं = णमोकार-मंत्र में "णमो आयरियाणं" पद का प्रयोग हुआ है, जबकि यहाँ 'गणहराणं' का | कुछ मर्म स्पष्ट हुआ? सामान्यतः पंच-परमेष्ठी में आचार्य पद का प्रयोग हुआ है | क्योंकि चतुर्विध-संघ के नायक 'आचार्य परमेष्ठी' होते हैं | तीर्थंकर परमात्मा के समवसरण में भी चतुर्विध-संघ विद्यमान होता है, किन्तु वहाँ उसके नायक आचार्य परमेष्ठी न होकर गणधरदेव होते हैं | यहाँ गणधरदेव को वंदन करके यह दोटूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि वे समवसरण में खड़े होकर वहाँ  विद्यमान पंचपरमेष्ठियों की वंदना कर रहे थे | और यह समवसरण सीमंधर स्वामी का ही संभव है, अन्य किसी की संभावना भी अशक्य है |

इसीप्रकार 'अज्झावयवग्गाणं' पद का प्रयोग भी विशिष्ट है.णमोकार-मंत्र में इसकी जगह 'उवज्झायाणं' पद का प्रयोग मिलता है | वैसे तो ' 'उपाध्याय' और 'अध्यापक' पदों को प्रायः समानार्थक माना गया है , परन्तु संघ में 'उपाध्याय' एक वैधानिक-पद है, किन्तु तीन लोक के नाथ के समवसरण में भगवान् की दिव्यध्वनि के बाद श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान करने वाले 'अध्यापक' कहे गये हैं, जबकि संघ को विधिवत् अध्यापन करानेवाले द्वादशांग के ज्ञाता को 'उपाध्याय' संज्ञा है | गणधरदेव भी यद्यपि द्वादशांग के ज्ञाता  होते ही हैं, तथा उपाध्याय के पच्चीस गुणों में ग्यारह अंग + चौदह पूर्व का ज्ञान ही इस संख्या की पूर्ति करता है | जबकि समवसरण में भगवान् की दिव्यध्वनि में द्वादशांग का भेद नहीं होता है | क्योंकि केवली के ज्ञान का संख्यातवां भाग ही दिव्यध्वनि में समाहित हो पाता है | और जितना भगवान् की दिव्यध्वनि में आता है, उसका संख्यातवां भाग ही द्वादशांग में समाहित होता है | ( ज्ञातव्य है कि धवलाकार ने संख्यातवां भाग की जगह दोनों जगह अनंतवां भाग प्रयोग किया है | मैंने कहीं और संख्यातवां भाग प्रयोग पढ़ा था, इसलिये यह लिखा है|)

इसप्रकार बाद में यह वर्गीकृत-संज्ञा (उपाध्याय)सार्थक प्रतीत होती है, न कि समवसरण में दिव्यध्वनि-काल में |  वहाँ के लिये यही (अध्यापक') ही अन्वर्थक व सुविचारित प्रतीत हो रहा है |

इन बिंदुओं से स्पष्ट है कि यह गाथा कुन्दकुन्दाचार्य देव ने सीमंधर स्वामी एवं समवसरण को लक्षित करके ही नहीं, बल्कि सीधे इस तथ्य को ज्ञापित करने के लिये ही विशेषतः लिखी है |

इसके बाद की गाथा में कुन्दकुन्दाचार्य देव यह स्पष्ट करने वाले हैं कि वे आखिर सीमंधर स्वामी के समवसरण में क्यों आये थे और उन्होंने वहाँ क्या पाया?

आखिरी मंगलाचरण की गाथा यह है :-----
" तेसिं विसुद्ध-दंसण-
णाण-पहाणीसमं समासेज्ज |
उवसंपयामि सम्मं,

जत्तो णिव्वाण-संपत्ती ||"

अर्थ:-- तेसिं= उनके, विसुद्ध-दंसण-णाण-पहाणासमं= दर्शन और ज्ञान प्रधान आश्रम को , समासेज्ज= प्राप्त करके, सम्मं= साम्यभाव को, उवसंपयामि= प्राप्त होता हूँ, जत्तो= जिससे, णिव्वाण-संपत्ती= निर्वाण की सम्यक्-प्राप्ति , ( होती है)|

यहाँ विचारणीय-बिन्दु निम्नानुसार हैं :-------

१. तेसिं = उनके,         यहाँ प्रश्न है किनके? सीमंधर स्वामी के/ पंचपरमेष्ठियों के/ शेष तीर्थंकरों के? किनके ?

उत्तर में ३ विकल्प हैं, विचार करें कौन सा विकल्प अधिक समीचीन है? 
पहला स्वयं सीमंधर स्वामी के,

दूसरा समवसरण में स्थित श्रमणों के?

या फिर तीसरा मात्र श्रेणी-आरोहण करनेवाले तद्भव-मोक्षगामी साधकों के?

२. विसुद्ध-दंसण-णाण-पहाणासमं= विशुद्ध- दर्शन-ज्ञान-प्रधान आश्रम को.

तो यह बात तो सामान्यतः तीनों पर लागू पड़ती है. फिर किसका ग्रहण किया जाये?

३. सम्मं = साम्यभाव को , उवसंपयामि= प्राप्त होता हूँ. 

तो साम्यभाव तो प्रायः सभी साधुओं में पाया जाता है. 
और फिर यह भी जानना जरूरी है कि कौन सा साम्यभाव? 
उत्तर है -
जत्तो णिव्वाण-संपत्ती= जिससे निर्वाण की सम्यक् प्राप्ति होती है | 
तो क्या निर्वाण की प्राप्ति भी दो तरह की होती है? 
हाँ, एक साक्षात् अर्थात् उसी भव से और दूसरी परम्परा से. अर्थात् दो-तीन भवों में.
बताइये क्या अब कुछ पकड़ में आया कि कुन्दकुन्दाचार्य देव क्या कहना चाहते हैं?
यदि अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुआ है, तो यह विचारिये कि कुन्दकुन्दाचार्य देव यहाँ से विदेहक्षेत्र गये ही क्यों थे? 
क्या उन्हें यहाँ कोई कमी थी? 
यहाँ संपूर्ण संघ का आचार्यपद प्राप्त था, सच्चे भावलिंगी संत थे, हर अंतर्मुहूर्त में निज ज्ञायकस्वभाव की निर्मलानुभूति भी उन्हें सहज होती ही थी.और आगमधर आचार्य थे ही, क्योंकि उनके ग्रंथ पूर्वज्ञान पर आधारित हैं. वे  सिद्धहस्त आगमग्रंथकार थे,उस समय तक समयपाहुड सहित तेरासी पाहुडग्रंथों की रचना वे कर चुके थे | तथा मोक्षमार्ग पर निरंतर अग्रसर थे, अतः कमी जैसी कोई बात की तो   संभावना भी प्रतीत नहीं हो रही है.
और यह भी तय है कि पर्यटन के लिये कदापि नहीं गये थे,
और न ही समवसरण घूमने या देखने का आकर्षण उन्हें था.
कोई पंचमकाल में विदेहगमन करने का आजकल के लोगों जैसा 'फॉरेनरिटर्न' जैसा रिकार्ड बनाने की लालसा भी उन्हें नहीं थी, क्योंकि वे लोकैषणा से बहुत दूर थे.

फिर क्यों गये थे? विचार कीजिये|

१. तेसिं = उनके, प्रश्न है किनके? सीमंधर स्वामी के/ पंचपरमेष्ठियों के/ शेष तीर्थंकरों के? किनके ? 
उत्तर में ३ विकल्प हैं, विचार करें कौन सा विकल्प अधिक समीचीन है? 
पहला स्वयं सीमंधर स्वामी के, 
दूसरा समवसरण में स्थित श्रमणों के?

या फिर तीसरा मात्र श्रेणी-आरोहण करनेवाले तद्भव-मोक्षगामी साधकों के? 

२. विसुद्ध-दंसण-णाण-पहाणासमं= विशुद्ध- दर्शन-ज्ञान-प्रधान आश्रम को.

तो यह बात तो सामान्यतः तीनों पर लागू पड़ती है. फिर किसका ग्रहण किया जाये?

३. सम्मं = साम्यभाव को , उवसंपयामि= प्राप्त होता हूँ. 

तो साम्यभाव तो प्रायः सभी साधुओं में पाया जाता है. 
और फिर यह भी जानना जरूरी है कि कौन सा साम्यभाव? 
उत्तर है -
जत्तो णिव्वाण-संपत्ती= जिससे निर्वाण की सम्यक् प्राप्ति होती है | 
तो क्या निर्वाण की प्राप्ति भी दो तरह की होती है?

हाँ, एक साक्षात् अर्थात् उसी भव से और दूसरी परम्परा से. अर्थात् दो-तीन भवों में. 

बताइये क्या अब कुछ स्पष्ट हुआ कि कुन्दकुन्दाचार्य देव क्या कहना चाहते हैं? 

पहले क्रम का उत्तर है --- "क्षपक-श्रेणी वाले श्रमणों को " .  

क्योंकि कुन्दकुन्दाचार्य देव को यहाँ साधना के यहाँ पर संभव  सारे  उच्चतम-मानदंड प्राप्त थे. नहीं था, तो तद्भवमोक्षगामिता की हेतु 'क्षपक-श्रेणी' की प्राप्ति. उन जैसे उग्र-पुरुषार्थी साधक के लिये 'सातिशय-अप्रमत्तसंयत गुणस्थान' प्राप्त करके क्षपक-श्रेणी द्वारा भवसंतति का अंत करके उसी भव से मोक्ष जाने की प्रक्रिया का साधन करना ही एकमात्र कारण था उनकी विदेहयात्रा का. इस चतुर्थकाल में ही संभव सर्वोत्कृष्ट- पुरुषार्थ को जीवंत देख पाना पंचमकाल में भरतक्षेत्र में संभव नहीं था, इसीलिये वे विदेहक्षेत्र में सीमंधर स्वामी के समवसरण में गये थे. क्योंकि विदेहक्षेत्र में सदा चतुर्थकाल ही रहता है, और वहाँ तीर्थंकरों का पूर्ण-विरह कभी नहीं होता है. 

यह बात उन्होंने यह कहकर एकदम पुष्ट कर दी है कि " मैं उस साम्यभाव को ही प्राप्त करना चाहता हूँ, जिससे साक्षात् निर्वाण की प्राप्ति होती है". यह राग-द्वेष के सूक्ष्मतम अंश से भी रहित स्वाभाविक पूर्ण- वीतरागभाव है, न कि "अरघावतारन असिप्रहारन में समताधरन" जैसा संयोगापेक्षी भाव. क्योंकि इस संयोगापेक्षीभाव को किसी भी रूप में साक्षात् मोक्ष का साधन नहीं कहा जा सकता है. एकमात्र वीतरागभाव ही तद्भवमोक्ष जाने का कारण है, और इसकी प्राप्ति जीव को क्षपक-श्रेणी द्वारा ही हो सकती है.और मात्र इसी को साक्षात् देखने वे विदेहक्षेत्र गये थे.

इस तथ्य की पुष्टि-हेतु मैं कुछ और प्रमाण प्रस्तुत करना चाहता हूँ. 

१. प्रवचनसार में वर्ण्य-विषय 'दर्शन-ज्ञान-चारित्र' नहीं हैं. बल्कि 'ज्ञान-ज्ञेय और चरणानुयोग की चूलिका अर्थात् सर्वोत्कृष्ट दशा ' है. ये ही तीन अधिकार इस ग्रंथ में हैं. क्योंकि केवलज्ञान एवं कई केवलज्ञानगम्य-विषय ही पंचमकाल में कुन्दकुन्दाचार्य को भरतक्षेत्र में उपलब्ध नहीं थे, और चारित्र की चूडामणि क्षपक-श्रेणी यहाँ संभव नहीं थी. इन्हीं के साक्षात्कार रे लिये वे वहाँ गये थे, और इन्हीं को वे वहाँ साक्षात् देखकर आये थे ,इसलिये इन्हीं तीन को उन्होंने इस ग्रंथ का वर्ण्य-विषय बनाया है.जबकि समयसार-सहित सभी ग्रंथों में उन्होंने 'दंसण-णाण-चरित्ताणि' कहकर सामान्यतः मोक्षमार्ग कहे गये सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र को वर्णित किया है. सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर प्रवचनसार में इस तथ्य का गहराई से अनुभव किया जा सकता है. हर गाथा का अर्थ तब एक नया आयाम ले लेगा, जब उसे इस दृष्टि से देखा जायेगा कि यह कथन कुन्दकुन्दाचार्य देव साक्षात् समवसरण में अपने को रखकर कर रहे हैं. मैं तो निरंतर इसका आनंद ले रहा हूँ, और दिल्ली के कुछ मुमुक्षुभाई भी मेरी इस आनंदयात्रा के साथी हैं, जिनके साथ इस ग्रंथराज की  76 गाथाओं का स्वाध्याय पूर्ण कर चुका हूँ. 

२. कुन्दकुन्दाचार्य देव उग्र-पुरुषार्थी थे, तभी तो उन्हें चारणर्द्धि प्राप्त थी, जिसके द्वारा वे विदेहक्षेत्र गये थे. आशंका मत कीजिये कि "पंचमकाल में तो रिद्धिधारी मुनिराज होते नहीं हैं", सामान्यतः पंचमकाल में तो मोक्ष भी नहीं होता है. पर इस हुंडावसर्पिणीकाल के प्रभाव से जब चार केवलियों के पंचमकाल में मोक्ष जाने की बात प्रमाणित( गौतमस्वामी, सुधर्मस्वामी-जंबूस्वामी ये तीन अनुबद्धकेवली एवं श्रीधरकेवली अननुबद्धकेवली पंचमकाल में ही मोक्ष गये हैं, क्योंकि भगवान् महावीर स्वामी के निर्वाण के समय चौथाकाल मात्र लगभग तीन वर्ष का ही शेष बचा था. जबकि गौतमस्वामी का निर्वाण उनके बारह वर्ष बाद हुआ था. और बाकी अनुबद्ध-केवलियों में भी बारह-बारह वर्षों का अंतराल माना गया है. इसप्रकार छत्तीस वर्ष तो इनके ही हो जाते हैं, व श्रीधरकेवली का काल इनसे अतिरिक्त है) है. जब मोक्ष जाने जैसा काम इस हुंडावसर्पिणीकाल के प्रभाव से पंचमकाल में संभव है, तब रिद्धि की प्राप्ति होना और उससे विदेहक्षेत्र जाने में कौन से आश्चर्य की बात है? हाँ, जिनवाणी प्रमाण है कि रिद्धियों की प्राप्ति मात्र उग्रतपस्वी , उत्कृष्ट चारित्र के धनी मुनिराजों को ही होती है, तो इससे सिद्ध हो जाता है कि कुन्दकुन्दाचार्य देव उग्रतपस्वी भी थे और उत्कृष्ट चारित्र के धनी थे. (संभवतः इसीलिये उनके कठोर-अनुशासन को संपूर्ण परंपरा ने नतमस्तक होकर स्वीकार किया और उन्हें " मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो" कहकर सर्वोत्कृष्ट आचार्य के रूप में मान्यता दी है )|

प्रोफ़ेसर सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली