वीरशासन जयन्ती

'वीर-शासन-जयन्ती' यह किसी तीर्थंकर-विशेष की महत्ता से जुड़ा पर्व नहीं है। भले ही इसमें अंतिम-तीर्थंकर भगवान् महावीर स्वामी का नाम जुड़ा हो। क्योंकि यदि यह उनसे जुड़ा पर्व होता, तो यह उनकी महत्ता बता रहा होता। परन्तु हम गंभीरता से देखें, तो ऐसा कुछ है ही नहीं। क्योंकि 'धर्मतीर्थ' के कर्त्ता या उपदेष्टा होने के कारण ही उन्हें 'तीर्थंकर' कहा जाता है। सभी तीर्थंकरों के साथ यही बात लागू पड़ती है। अर्थात् वे पंचकल्याणकों के कारण 'तीर्थंकर' नहीं कहे जाते हैं, न ही सौ इन्द्रों के द्वारा पूजित होने से वे 'तीर्थंकर' कहे जाते हैं। समवसरण आदि विभूतियों और अन्य जन्म के, ज्ञान के, देवकृत आदि अतिशयों के कारण भी उनकी 'तीर्थंकर' संज्ञा नहीं है। -- बहुत से लोगों को यह तथ्य पता ही नहीं है। 

         यदि पंचकल्याणकों के कारण उनकी 'तीर्थंकर' संज्ञा होती, तो विदेहक्षेत्र के कई तीर्थंकरों के पाँच कल्याणक होते ही नहीं हैं। दो या तीन ही होते हैं। तब वे 'तीर्थंकर' कैसे कहे जाते हैं ? इसीप्रकार सौ इन्द्र तो सामान्य-केवलियों की भी वंदना करने आते हैं, परन्तु वे सभी 'तीर्थंकर' तो नहीं होते हैं।

रही बात खून के सफेद होने आदि अतिशयों की, तो ये तो कई अन्य महापुरुषों के भी वे पाये जाते हैं; किन्तु वे 'तीर्थंकर' पदवी के धारक नहीं होते हैं। तब यह निर्णय किया जाना अपरिहार्य हो जाता है कि 'तीर्थंकर' पदवी का नियामक कारण क्या होता है?

         तो हमें सिद्धान्त-ग्रन्थों से प्रामाणिक मार्गदर्शन लेना होगा। सिद्धान्त-ग्रन्थों के अनुसार 'तीर्थंकर' नामकर्म नामक एक कर्मप्रकृति है, जिसके उदय से 'तीर्थंकर' कहे जाते हैं। और इसकी प्रकृति का उदय तेरहवें गुणस्थान में केवलज्ञान प्रकट होने पर ही होता है। अतः स्पष्ट है कि पंचकल्याणकों में से तीन कल्याणक इसके पहले गारंटी से हो चुके होते हैं, अतः कल्याणक 'तीर्थंकर'-प्रकृति के कारण नहीं होते हैं--यह स्पष्ट हो जाता है। इसीप्रकार खून का सफेद होना आदि कार्य भी 'तीर्थंकर'-प्रकृति के उदय से नहीं होते हैं, क्योंकि ये भी जन्मजात होते हैं, जबकि 'तीर्थंकर' प्रकृति का उदय ही तेरहवें गुणस्थान में होता है। देवकृत-अतिशय भी अन्य-अन्य प्रसंगों पर सामान्य-केवलियों के साथ भी घटित होते हैं, अतः उन्हें भी 'तीर्थंकर'-प्रकृति का कार्य नहीं कहा जा सकता है। और ये कार्य 'तीर्थंकर'-प्रकृति के उदय से होते भी नहीं हैं। 

           'तीर्थंकर'-प्रकृति के उदय से कोई एक अनिवार्य-कार्य जो होता है, और जिसके कारण 'तीर्थंकरत्व' सार्थक होता है, तो वह कार्य है 'समवसरण में दिव्यरूप में धर्मोपदेश होना', जो कि बारह-सभाओं में विद्यमान दोनों, मनुष्यों और तिर्यंचों के सभी जीवों को अपनी-अपनी भाषाओं में समझ में आना। अर्थात् भाषा के भेद के बिना ही सबको उनका उपदेश समझ में आना , प्राणीमात्र को हितकारिणी-वाणी, उनकी करुणा का प्रतिफल प्राप्त होना। और यह है उनकी ऊँकारमयी या सर्वभाषामयी कही जाने वाली दिव्यध्वनि का खिरना। 

           यहाँ यह प्रश्न स्वाभाविक है कि करुणा तो रागरूप कही गयी है, और 'तीर्थंकर' केवलियों के राग-द्वेष का पूर्ण-अभाव होता है। तब करुणा का प्रतिफल दिव्यध्वनि को कैसे कहा जा सकता है ? --इसका उत्तर यह है कि करुणारूप वात्सल्यभाव ही 'तीर्थंकर'-प्रकृति के बंधने में मुख्य-हेतु माना गया है--

"वत्सल-अंग सदा जो ध्यावै, सो 'तीर्थंकर'-पदवी पावै।"

और जिनवाणी प्रमाण है कि करुणा को सर्वदा रागरूप नहीं माना गया है। --( द्र. धवला,13/5,5,48/361)

      तथापि रागरूप भाव से ही बंध होता है, और 'तीर्थंकर'-प्रकृति भी कर्मप्रकृति है, उसके भी बंध-उदय आदि होते हैं। किंतु बंधते समय तक ही होते हैं; इसका उदय तो वीतराग-अवस्था में ही होता है। अतः कारण अवस्था में रागरूप भले ही रही हो, किन्तु इसकी फल-अवस्था में जीव की स्थिति वीतरागरूप ही होती है। और यह प्रकृति 'नामकर्म' नामक 'अघातिया-कर्म' की है, अतः वीतराग-अवस्था में इसका उदय होने में कोई बाधा नहीं होती है।

        चूँकि जब यह प्रकृति बंधना प्रारम्भ होती है, तब उस जीव के जो आत्मिक-सुख उसने प्राप्त किया है, उसे बिना किसी भेदभाव के प्राणीमात्र को समझाने का करुणभाव उसके निरन्तर बना रहता है। निरन्तर बने रहने का प्रमाण यही है कि 'तीर्थंकर'-प्रकृति निरन्तर बँधनेवाली प्रकृति है, एक बार बंधना शुरू हुआ, तो जब तक इसका उदय प्रारम्भ नहीं हो जाता है, तब तक यह निरन्तर बंँधती रहती है। और इसका उदय केवलज्ञान होने के बाद ही प्रारम्भ होता है, तथा केवलज्ञान पूर्ण-वीतरागता होने पर ही होता है। अतः जब तक प्राणीमात्र के प्रति करुणारूप-रागभाव रहता है , तब तक यह प्रकृति निरन्तर बँंधती रहती है। और ज्यों ही इसका उदय प्रारम्भ होता है, तब बंध के कारण के अभाव में इसका बंध भी रुक जाता है। इसीकारण मैंने अभी कहा था कि 'तीर्थंकर'-प्रकृति बाँंधनेवाले जीव के प्राणीमात्र के प्रति करुणाभाव ( कि इस सच्चे सुख के साधन आत्मस्वरूप को व इसकी अनुभूति की विधि को प्राणीमात्र समझे, कोई वंचित न रहे) निरन्तर चलता रहता है। और जब यह करुणाभाव बंद होता है, तो इसके निमित्त से बंँधी प्रकृति 'तीर्थंकर-नामकर्म-प्रकृति' का उदय आ जाता है और इसका फल मिलने लगता है। इसीलिये मैंने करुणाभाव को दिव्यध्वनिरूप 'तीर्थंकर'-प्रकृति का फल कहा था।

        अस्तु, यह तो स्पष्ट हो चुका है कि दिव्यध्वनि का होना ही 'तीर्थंकर'-प्रकृति का मुख्य-कार्य है। और हर 'तीर्थंकर' के यह होता ही है। इस दिव्यध्वनि या आत्महितकारी-दिव्यध्वनि को ही 'शासन' कहा जाता है। तथा इस शासन के कर्त्ता होने से 'तीर्थंकर' को 'शास्ता' कहा गया है। दूसरे शब्दों में कहें, तो दिव्यध्वनि के द्वारा प्राणीमात्र को बिना किसी भेदभाव के आत्महितकारी उपदेश देने के कारण ही "अमुक तीर्थंकर का शासन है"-- ऐसा वचन प्रयोग किया जाता है।

          वर्तमान-शासननायक 'तीर्थंकर' महावीर स्वामी के साथ भी यही बात लागू होती है। अर्थात् उनका शासन ही 'वीरशासन' है और यह जिस दिन प्रारम्भ हुआ था, उस दिन को ही 'वीर-शासन-जयन्ती' की संज्ञा दी गयी है।

         अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि केवलज्ञान तो सभी तीर्थंकरों को होता है और उसके साथ ही सभी तीर्थंकरों दिव्यध्वनि द्वारा धर्मोपदेश प्रारम्भ कर देते हैं, किन्तु अन्य तीर्थंकरों की शासन-जयन्तियाँ नहीं मनायीं जातीं हैं, मात्र अन्तिम-तीर्थंकर भगवान् महावीर स्वामी की ही अलग से शासन-जयन्ती क्यों मनायी जाती है?

          उत्तर यह है कि अन्य-तीर्थंकरों का धर्मोपदेश उनको केवलज्ञान की प्राप्ति की तिथि से ही प्रारम्भ हो गया था, जबकि भगवान् महावीर स्वामी को केवलज्ञान प्राप्त होने की तिथि 'बैशाख-शुक्ल-दशमी' से लगभग छियासठ (66) दिनों के बाद 'श्रावण-कृष्ण-प्रतिपदा' को उनकी दिव्यध्वनि होना प्रारम्भ हुई थी। अतः अंतिम-तीर्थंकर भगवान् महावीर स्वामी की केवलज्ञान-कल्याणक की तिथि भिन्न है और उनकी प्रथम-दिव्य-देशना की तिथि भिन्न है। इसीलिये इनकी शासन-जयन्ती अलग से मनाने की सार्थकता है। अन्य-तीर्थंकरों के केवलज्ञान-कल्याणक की तिथि को ही 'शासन' का शुभारम्भ हो जाने से मात्र केवलज्ञान-कल्याणक ही उल्लिखित होता है, शासन-जयन्ती उसी में अधिगत (अंडरस्टुड) माने जाने से उसका अलग से कोई उल्लेख नहीं किया गया है।

        अब एक महत्त्वपूर्ण-प्रश्न यह उपस्थित होता है कि जब अन्य सभी तीर्थंकरों के केवलज्ञान-कल्याणक की तिथि पर ही दिव्यध्वनि प्रदान करने की प्रक्रिया प्रारम्भ होने की विधि सम्पन्न होती रही है, तो वर्तमान-शासननायक तीर्थंकर महावीर स्वामी के साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ? उनकी केवलज्ञान-कल्याणक की तिथि और दिव्यध्वनि प्रदान करने की तिथि अलग-अलग क्यों हुईं? 

         आसान उत्तर यही है कि गणधर की उपस्थिति नहीं होने से केवलज्ञान-कल्याणक के दिन से ही दिव्यध्वनि प्रदान करने की प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं हो सकी। छियासठ दिनों के बाद 'श्रावण-कृष्ण-प्रतिपदा' को जब गणधर का सुयोग हुआ, तब दिव्यध्वनि प्रारम्भ हुई। अन्य तीर्थंकरों के केवलज्ञान-कल्याणक के समय ही गणधरदेव की उपस्थिति बनती रही, अतः उनकी दिव्यध्वनि भी उसी दिन प्रारम्भ हो गयी।

       अब इस स्थिति में दो प्रश्न होते हैं, पहला तो यह कि क्या 'तीर्थंकरत्व' भी निमित्त-आश्रित होता है। जो दिव्यध्वनि रूपी तीर्थ के प्रधान तो तीर्थंकर होते हैं, पर उनकी दिव्यध्वनि गणधर रूपी निमित्त के बिना नहीं होती है? दूसरा यह कि फिर दिव्यध्वनि के अभाव में महावीर स्वामी का 'तीर्थंकरत्व' कैसे माना जाये?

            पहले प्रश्न का तो उत्तर स्पष्ट है, क्योंकि 'धर्मतीर्थ' के प्रवर्तन या दिव्यध्वनि होने रूप जो क्रिया है, वह भी 'तीर्थंकर'-नामकर्म-प्रकृति के उदय से होनेवाला निमित्त-आश्रित कार्य है; कोई तीर्थंकर-परमात्मा उपयोगपूर्वक यह कार्य नहीं करते हैं, अतः निमित्त-आश्रित कार्य होने से तीर्थंकर-परमात्मा पर किसी तरह की कोई आपत्ति लागू ही नहीं पड़ती है। वाणी भी पौद्गलिक-परिणति है, और निमित्तभूत 'तीर्थंकर-प्रकृति-नामकर्म' भी पुद्गलरूप ही है। उनके इसप्रकार सहज कारण-कार्यपना होने में कोई आपत्ति की बात ही नहीं है। उनके परस्पर सहज ही ऐसा निमित्त-नैमित्तिकपना पाया जाता है।

         रही बात गणधरदेव की उपस्थितिरूप निमित्त पर आश्रित होने की, तो इसके भी कर्त्ता न तो तीर्थंकर-परमात्मा हैं, और न ही गणधरदेव। क्योंकि तीर्थंकर-परमात्मा ने न तो गणधरदेव को आने से रोका था, और न ही अब बुलाकर लाये थे। तथा गणधरदेव भी न तो पहले जानबूझकर अपनी महत्ता बताने के लिये आने में बिलम्ब किया था, और न ही अब वे किसी स्वार्थवश आये थे। यह तो सहज-संयोग था, जो इस प्रकार से घटित हुआ था। इनका परस्पर निमित्त-नैमित्तिक-संबंध भी सहज ही है; क्योंकि इनका पारस्परिक नियोग ही ऐसा है। इसमें इतरेतराश्रय-दोष जैसी संभावना तक नहीं है। क्योंकि 'तीर्थंकरत्व' की आत्मिक-साधना तो गणधरदेव के बिना ही हो जाती है, तथा गणधरत्व की योग्यता भी जीव की स्वयं की व स्वयं के पुरुषार्थ से ही प्रकट होती है। न तो तीर्थंकर परमात्मा उस में कोई मदद करते हैं और न ही बाधा डालते हैं। जैसे कि 'क्षायिक-सम्यग्दर्शन' की प्राप्ति में 'केवली का पादमूल मिलना' परस्पर निमित्त-नैमित्तिकपना कहा जाता है, किन्तु इसमें कोई भी एकदूसरे का कर्त्ता-कर्म नहीं होता है। यदि हो, तो केवली के पादमूल में बैठनेवाले हर जीव को 'क्षायिक-सम्यग्दर्शन' की प्राप्ति हो जानी चाहिये। और तीर्थंकर परमात्मा के निकटस्थ कोई भी मुनिराज गणधर बन जाते। किन्तु ऐसा होता नहीं है, अतः यह दोनों की अलग-अलग परिणतियाँ हैं। कोई किसी का कर्त्ता-कर्म नहीं है। निमित्त-नैमित्तिकपने का उपचार तो कहा जाता है, उसे निमित्ताधीन-दृष्टि वाले कहेंगे, कोई नहीं रोक सकता है। क्योंकि प्रत्येक जीव की परिणति स्वतंत्र हैं। 

           चरम-तीर्थंकर भगवान् महावीर स्वामी के साथ भी ऐसी सहज-व्यवस्था देखने को मिली। इसमें 'क्रमबद्धपर्याय' जैसे महान्-सिद्धान्त की भी सहज-व्यवस्था देखने को मिलती है । क्योंकि समवसरण जैसी लोक की सर्वोत्तम-सभा का व्यवस्थापक सौधर्मेन्द्र जैसा लोकोत्तर-व्यक्तित्व था। वह सभा भी अनुपम थी और उसका व्यवस्थापक भी अनुपम ही था। न ही कोई कमी थी, और यदि कोई कमी कदाचित् रह भी गयी होती, तो सौधर्मेन्द्र के अवधिज्ञान से छुपी नहीं रह सकती थी। पर इसे 'क्रमबद्धपर्याय' की ही विशेषता कहें कि वह कमी सौधर्मेन्द्र जैसे अद्वितीय-मेधा के धनी सर्वोत्कृष्ट-व्यवस्थापक को पूरे छियासठ(66) दिनों तक पकड़ में नहीं आयी। 

        ज्यों ही आषाढ़-मास की तपन शांत हुई और भरतभूमि पर सावन की घनघोर-घटायें छायीं, तब सौधर्मेन्द्र के मन में भी विकल्प जागा कि इन घटाओं के बरसने से पहले दिव्यध्वनि की अजस्रधारा बरसनी ही चाहिये। बस, काललब्धि पक चुकी थी, निमित्तरूप में अवधिज्ञान भी सावधान हुआ और भरतभूमि पर गणधरदेव की पात्रता वाले परम-सौभाग्यशाली भव्यजीव को उसने तत्काल परख लिया। किन्तु वह यह जानकर हतप्रभ रह गया कि अरे! यह जीव, जो गणधरदेव की योग्यता वाला ज्ञात हो रहा है, वह तो वर्तमान में 'गृहीत-मिथ्यादृष्टि' है। वैदिक-कर्मकांडों में रागी-देवताओं को आहुतियाँ देकर उनसे भौतिक-वस्तुओं की प्राप्ति की अपेक्षा करता है। अभी इसे वैराग्य का भाव भी जागृत नहीं हुआ है, तो यह निर्ग्रन्थ-मुनिमुद्रा को कैसे अंगीकार कर सकेगा ? क्योंकि 'गृहीत-मिथ्यात्व' के परिणामों के रहते तो वैराग्य भी संभव नहीं है, तो निर्ग्रन्थ-मुनिमुद्रा इसके कैसे संभव है ? किन्तु भवितव्यता में उसी का गणधरपना स्पष्ट झलक रहा था।

          वैसे भी एक-एक समय की पर्याय स्वतंत्र है। सम्पूर्ण विश्व के प्रत्येक द्रव्य और उसका त्रिकालवर्ती पर्यायों की परिपूर्णता का, उनकी स्वयंप्रभुता का घोष करनेवाला विश्व में एकमात्र जिनेन्द्र भगवान् का दर्शन ही है। और यह कार्य उसका डिंडिम-घोष करता हुआ प्रतीत हो रहा था। क्योंकि अनन्तवीर्य के धनी तीर्थंकर परमात्मा महावीर स्वामी और लौकिक-उपलब्धियों का सर्वोत्कृष्ट-स्वामी सौधर्मेन्द्र--- इन दोनों की अपार-क्षमताओं के बाद भी छियासठ दिनों तक जो कार्य नहीं होना था, उसके लिये सर्वतः सक्षम होते हुये भी किसी का ध्यान उस ओर नहीं गया। और काललब्धि आते ही सब कुछ नज़र आने लगा। 

         इन्द्रभूति गौतम जैसे उस समय के महाज्ञानी व्यक्तित्व को समवसरण में कैसे लाया जाये ?--- इसके लिये सौधर्मेन्द्र ने सटीक प्रक्रिया अपनायी। क्योंकि इन्द्रभूति गौतम वैदिक-कर्मकांडों और तत्सम्बन्धी ज्ञान-विज्ञान का धनी तो था, किन्तु साम्प्रदायिक-विद्वेष के कारण हो या उनके गुरु ने उन्हें इसमें विषय में नहीं सिखाया हो, जो भी कारण रहा हो; पर यह सत्य था कि महाज्ञानी होते हुये भी इन्द्रभूति गौतम को जैन-तत्त्वज्ञान के विषय में कुछ भी जानकारी नहीं थी। अतः सौधर्मेन्द्र जैसे अद्वितीय-मेधा के धनी व्यक्तित्व ने इन्द्रभूति गौतम को प्रिय प्रतीत होने वाले वैदिक-धर्मानुयायी ब्राह्मण का वेश धारण किया , तब इन्द्रभूति गौतम के सामने जाकर जैन-तत्त्वज्ञान के सभी प्रमुख-बिन्दुओं को ( "त्रैकाल्यं द्रव्यषटकं नवपद-सहितं जीव षट्काय लेश्या। पञ्चान्ये चास्तिकाया......."इत्यादि प्रचलित पद्य इन्द्रभूति गौतम को प्रिय लगनेवाली संस्कृतभाषा में निबद्ध कर के सुनाया ) जिज्ञासा-स्वरूप प्रस्तुत किया। अब इन्द्रभूति गौतम ने उनके नाम तक नहीं सुने थे, परिचय तो उसे क्या होता? परन्तु ज्ञान का मद उसे प्रज्ञा-परीषह बनकर सता रहा था, अतः उसने स्वीकार नहीं किया कि "वह इनके बारे में कुछ नहीं जानता है।" उल्टे वह अभिमानपूर्वक बोला कि "मैं तुम जैसे अल्पज्ञ से वार्त्तालाप नहीं करता, तुम्हारे गुरु से मैं शास्त्रार्थ कर सकता हूँ।" सौधर्मेन्द्र तो यही चाहता था, और उसे पता था कि यह प्रज्ञा-परीषह से पीड़ित होकर ऐसा ही कहेगा। सब कुछ उनकी मर्जी के मुताबिक ही चल रहा था। 

            सौधर्मेन्द्र जब इन्द्रभूति गौतम को लेकर तीर्थंकर परमात्मा महावीर स्वामी के समवसरण में पहुँचा, तो प्रवेश करते ही सर्वप्रथम मानस्तम्भ के दिव्य-दर्शन हुये। 'मानस्तम्भ' -- जैसा नाम है, वैसा ही इसका निमित्त-नैमित्तिक प्रभाव भी सहज ही होता है। समवसरण में लोक के सर्वोत्तम-पुण्य के धनी तीर्थंकर परमात्मा के विराजमान रहते अन्य किसी की मान कषाय यदि सजग रह जाये, तो फिर तीर्थंकर-प्रकृति को सर्वोत्कृष्ट-पुण्य-प्रकृति कौन कहेगा? अतः 'मानस्तम्भ' के रूप में प्रथम-दर्शन मात्र से ही इन्द्रभूति गौतम का क्षुद्र-क्षयोपशम-जन्य मान विगलित हो गया। विनम्रता का भाव उनके हृदय में हिलोरें मारने लगा। वे अत्यन्त विनय और उत्सुकता से तीर्थंकर परमात्मा महावीर स्वामी के दर्शनार्थ समवसरण की सीढ़ियाँ चढ़ने को उद्यत हुये। समवसरण की महिमा ऐसी होती है कि विनयभाव से भरा कोई भी भक्त पहली सीढ़ी पर ज्यों ही कदम रखता है, तो क्षणभर में ही वह बीसियों हजार सीढ़ियाँ पार करते हुये छठवीं पृथवी तक पहुँचा जाता है। इसके ऊपर सातवीं पृथवी को पार कर आठवीं पृथवी पर पहुँचने पर परम-वीतराग प्रशान्तमुद्रा के धनी तीर्थंकर परमात्मा महावीर स्वामी के दिव्य-दर्शन हुये। अहो! स्वप्न में भी जिसकी कल्पना नहीं कर सके थे--ऐसे अनिर्वचनीय-स्वरूप के दर्शन होते ही जिनेन्द्र देव की अंतर्मुख-मुद्रा के दर्शन होते ही अंतर में उतरने व स्वरूप में समाने की निःशब्द पावन-प्रेरणा मिली। परिणामस्वरूप वे अंतर में गहरे उतरते गये। समवसरण जैसा परम-पवित्र वातावरण, तीर्थंकर परमात्मा जैसे महानतम पुण्यशाली व्यक्तित्व, और परम-वीतराग प्रशान्तमुद्रा का सान्निध्य-- ये सब आत्मानुभूति के लिये सर्वोत्कृष्ट-सहयोगी कारण मिले और अंतर में पुरुषार्थ का प्रचंड-वेग तो उमड़ ही रहा था। बस, और क्या चाहिये था? अंतर में गहरे उतरते गये। परमानन्द की निर्मल-अनुभूति के साथ ही जब बाहर में उपयोग आया, तो प्रभु की प्रशान्तमुद्रा के प्रति, उनकी अविचल स्वरूपानुभूति के प्रति अनिर्वचनीय-बहुमान जागृत हुआ। निर्निमेष-दृष्टि से प्रभु को निहारते-निहारते ही अज्ञान के पटल हटते गये और ज्ञान की सामर्थ्य उघड़ती गयी। इसके साथ ही बंधन के प्रतीक वस्त्र आदि के आवरण भी उतरते गये। निःसंग , निर्ग्रन्थ-मुनिमुद्रा प्रकट हुई और अन्ततः चारों ज्ञानों के धारी बनकर वे विनीतभाव से उनके चरणों में बैठने के लिये प्रेरित हुये; परन्तु यह क्या? उनके कदम स्वतः ही गणधरदेव के कोठे की तरफ बढ़ने लगे। विधि का यही विधान था कि यहाँ इन्द्रभूति गौतम की पात्रता पूर्ण हुई और उधर भगवान् महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि खिरने का समय आया। 

         भगवान् की वाणी का एक वर्ण भी व्यर्थ न होने पाये-- इसमें भाव से सन्नद्ध गणधरदेव के कोठे में आकर विराजमान होते ही प्रभु की जलधर-मेघों की गर्जना-सी गम्भीर ऊँकारमयी दिव्य-देशना प्रारम्भ हो गयी। समवसरण में विराजमान लोग एक बार तो सावन के मेघों की गर्जना समझ बैठे , परन्तु अगले क्षणभर में ही उन्हें यथार्थ का प्रतिबोध हुआ और इसतरह वीर का शासन प्रवर्तित हो गया।

          ऐसा नहीं है कि गणधरदेव जैसी बाह्य-योग्यताओं के धनी जीव भगवान् के समवसरण में नहीं थे। मुनिराज भी थे, मति-श्रुत-अवधि-मनःपर्यय --इन चार ज्ञानों के धारी भी थे, द्वादशांगी-श्रुत के पाठी श्रुतकेवली भी थे (ज्ञातव्य है कि अध्यापक या उपाध्याय-परमेष्ठी के पच्चीस-गुण जो कहे गये हैं, उनमें ग्यारह-अंग एवं चौदह-पूर्व की संख्या 11+14=25 मिलाकर ही पच्चीस-गुण कहे गये हैं। अतः प्रत्येक उपाध्याय-परमेष्ठी द्वादशांगी-श्रुत के पाठी श्रुतकेवली सिद्ध होते हैं, और अध्यापक या उपाध्याय-परमेष्ठी वहाँ पहले से थे--इसमें किसी के आपत्ति की संभावना मुझे नहीं है।); तब क्या कमी थी, जो अन्य कोई गणधरदेव के पद पर आसीन नहीं हो सके ?-- यह महत्त्वपूर्ण-प्रश्न है। कोई गहन-आगमाभ्यासी ही इसका उत्तर दे सकता है।  वास्तविकता का कथन 'आचार्य वीरसेन स्वामी' ने 'धवला' महाग्रन्थ में किया है कि "तीर्थंकर परमात्मा केवलज्ञान में जितना जानते हैं, उसका अनंतवाँ-भाग उनकी वाणी में आ पाता है। जितना भगवान् की वाणी में आता है, उसका अनंतवाँ-भाग गणधरदेव ग्रहण कर पाते हैं। जितना गणधरदेव ग्रहण कर पाते हैं, उसका अनंतवाँ-भाग द्वादशांगी-श्रुत के रूप में ग्रथित होता है। और जितना द्वादशांगी-श्रुत में निबद्ध हुआ था, उसका भी अनंतवाँ-भाग आज हमें आगम के रूप में मिल रहा है।"
            --- 'धवला' नामक सिद्धान्त-ग्रंथ के उक्त-प्रतिपादन से यह स्पष्ट हो जाता है कि गणधरदेव द्वादशांगी-श्रुत से अनंतगुना जानते हैं। यही वह विशेषता है कि द्वादशांगी-श्रुत के ज्ञाता श्रुतकेवली के रहते हुये भी तीर्थंकर परमात्मा की दिव्यध्वनि नहीं खिरती है। क्षयोपशम-ज्ञान की सर्वोत्कृष्ट-परकाष्ठा के स्वामी गणधरदेव होते हैं। और तीर्थंकर परमात्मा जैसे सर्वोत्कृष्ट-वक्ता के वचन यदि सर्वोत्कृष्ट-श्रोता के बिना नहीं खिरते -- तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? लोक में भी ऐसा सहज शिष्टाचार देखा जाता है कि यदि राष्ट्रपति महोदय किसी प्रान्त में पदार्पण करते हैं, तो उस प्रान्त की सत्ता का सर्वोच्च-प्रतिनिधि अर्थात् मुख्यमन्त्री उसकी सभा का प्रमुख-उत्तरदायी होता है। शिष्टाचार का परिपालन -- यह विशेषता तो शिष्टजनों में सर्वत्र ही सहज देखी जाती है। इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है, जो आपत्ति के योग्य माना जाये। यही नियोग तीर्थंकर परमात्मा और गणधरदेव के मध्य सहज ही पाया जाता है। इसमें किसीप्रकार की कर्त्ता-कर्म जैसी व्यवस्था नहीं होती है, फिर भी ऐसी सहजता पायी ही जाती है।

         एक बात और, समवसरण में जीवों के परिणामों की पवित्रता और प्रशान्तता कैसी अद्भुत होती है?-- यह हमें इस प्रसंग में गम्भीरता से विचारणीय भी है और अनुकरणीय भी। सोचिये , कि यदि हम किसी सभा में किसी का व्याख्यान सुनने के लिये जायें, जाकर बैठ जायें, वह व्यक्तित्व भी वहाँ विराजमान हो, किन्तु उसका व्याख्यान/उपदेश नहीं हो, तो आपको कैसा लगेगा? और ऐसी स्थिति हर रोज दिन में तीन बार घटित हो, तो हम कितने दिनों तक जायेंगे? विचार करिये। ऐसा लगातार जो माह से भी अधिक समय तक निरन्तर चला, तब भी उस सभा का न तो कोई श्रोता कम हुआ और न ही किसी ने व्यग्रता दिखायी। प्रभु की परम-वीतराग प्रशान्तमुद्रा के दर्शन मात्र से ही वे संतृप्त बने रहे। क्या हम ऐसा सोच भी पाते हैं? "जब होनहार होगी, तब कार्य हो जायेगा ; व्यग्रता की आवश्यकता नहीं है"-- ऐसा कहनेवाले स्वयं कितने इसका अनुपालन कर पायेंगे? विचार कीजिये कि भगवान् के समवसरण में जाने वाले जीवों के परिणामों की जाति कैसी होती है? और हम "जिनमंदिर जिन-समवसरण-सम" के नारे तो लगाते हैं; परन्तु कभी हमने विचार भी किया है कि भगवान् के समवसरण में जाने के योग्य पात्रता क्या हममें है? क्या उन छियासठ दिनों के नियमित-श्रोताओं जैसा 'क्रमबद्धपर्याय' पर अटूट-विश्वास हममें है? क्या 'वीर-शासन-जयन्ती' हम जैसे उत्सवप्रिय लोगों के लिये कोई सार्थक-संदेश देने में सफल रही है? यदि नहीं, तो विचार कीजिये कि कमी कहाँ है, आयोजन में या प्रयोजन में ???

 

प्रोफ़ेसर सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली