आचार्य कुन्दकुन्द क्यों संपूर्ण परंपरा के लिये 'आद्य' बन गये?

हमारी आचार्य-परंपरा के बारे में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जैन-परंपरा के लिये आचार्य कुन्दकुन्द एक प्रतिमान के रूप में बताये गये--

"मंगलं भगवदो वीरो, मंगलं गोदमो गणी |
मंगलं कुंदकुंदज्जो, जेण्हं धम्मोत्थु मंगलं ||"

इसी प्राकृत-पद्य का संस्कृत-रूपांतर यह है

" मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमो गणी | 
मंगलं कुन्दकुन्दाद्यः, जैनं धर्मोस्तु मंगलम् ||"

इसमें गंभीरता से विचारणीय बात  यह है कि  भगवान् श्री महावीर स्वामी एवं गौतम गणधर के बाद एक लंबी परंपरा हुई, जिसमें २ केवली, ५ श्रुतकेवली, अनेकों श्रुतधर-आचार्य  हुये; फिर भी कुन्दकुन्दाचार्य को ही "आद्य" क्यों कहा गया?

इसका उत्तर देने के पूर्व मैं आपको एक अन्य वृत्तांत बताना चाहता हूँ | 
कवि कालिदास के बारे में एक कथन बहुप्रचलित है--

" पुरा कवीनां गणना-प्रसंगे, |
कनिष्ठिकाधिष्ठित-कालिदासः ||
अद्यापि तत्तुल्य-कवेरभावात्, |
अनामिका सार्थवती बभूव || "

अर्थ:- प्राचीनकाल में जब कवियों की गणना के प्रसंग में कवि कालिदास का नाम कनिष्ठिका अर्थात् सबसे छोटी अंगुली पर रखा गया | किन्तु आज तक उनके समान कोई कवि न होने के कारण (कनिष्ठिका की अगली अंगुली  का) 'अनामिका' (बिना नाम वाली) -- यह नाम सार्थक हो गया |

यह एक उक्ति भले ही हो , किन्तु संस्कृत-कवियों के बारे में यह उक्ति आज भी सार्थक है| जिन्होंने कालिदास के साहित्य का अध्ययन किया है, वे इस तथ्य से व इसके कारणों से भली भाँति परिचित हैं |

परंतु हम लोग " मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो" पढ़ते तो हैं, किन्तु मात्र रूढि से  ; बहुत विरले ही लोग ऐसे हैं, जो इसके कारण से परिचित हैं या जिन्होंने इसकी गहराई को जानने की कोशिश की हो | अतः इस आलेख के माध्यम से मैं सप्रमाण उन तथ्यों को रेखांकित करने की चेष्टा करूँगा, जिनके कारण आचार्य कुन्दकुन्द संपूर्ण परंपरा के लिये 'आद्य' बन गये |

१. अकर्तृत्वभाव के अभिज्ञापक :- अकर्तावाद यह जैनधर्म की मूल-पहिचान सदा से था | अनादिकाल से केवलियों ने कण-कण की स्वाधीन-सत्ता की घोषणा की है | कोई किसी का कर्त्ता-हर्त्ता नहीं है-- यह स्पष्ट बताया है |
किन्तु कुन्दकुन्दाचार्य के समय तक लिखे आगमग्रंथों में इस बात का स्पष्ट-उल्लेख कहीं नहीं था | इसकारण इस दर्शन की मूल-पहिचान ही कहीं स्पष्ट नहीं पता चल रही थी | 
तब कुन्दकुन्दाचार्य ने ग्रंथाधिराज 'समयपाहुड' में मूल विषयवस्तु (नवपदार्थ-विवेचन) से हटकर इसकी विवेचना की | पहले तो 'कर्त्ता-कर्म-अधिकार' में इसे भलीभाँति स्पष्ट किया, और फिर जब पूरी तसल्ली नहीं हुई , तो ' सर्व-विशुद्ध-ज्ञान - अधिकार' लिखकर पुनः इसी विषय को और गहराई से समझाया |  
इसके परिणामस्वरूप टीकाकार अमृतचंद्राचार्य ने प्रमाणित करते हुये लिखा -
" अकर्त्ता जीवोsयं स्थित इति विशुद्धः स्वरसतः| "

आज विश्वभर के सभी दर्शनों से सर्वज्ञदर्शन की मौलिकता का यही प्रमुख-अभिज्ञान है |
इससे आत्मा देह की विषय-भोगादिक क्रियाओं का ही नहीं, व्रतादिक क्रियाओं का भी कर्त्ता नहीं है--यह उन्होंने डंके की चोट सिद्ध किया |

२.आत्मविश्वास के उन्नायक :-  वैसे तो आत्मतत्त्व में विश्वास करना - यही आस्तिकता की पहिचान है | कहा भी गया है----
"आस्तिक्यम् आत्मविश्वासः " |
'जीव' संज्ञा के अंतर्गत सभी जीव आ जाते हैं, किन्तु 'आत्मा'--यह शब्द मात्र निज चैतन्य के अतिरिक्त अन्य जीव का भी वाचक नहीं है--- यह बात कुन्दकुन्दाचार्य ने अपने सभी ग्रंथों में बारंबार सिद्ध की है | 'णियमसारो' ग्रंथ में 
"जीवादि-बहितच्चं हेयमुवादेयमप्पणो अप्पा" 
कहकर इस बात का मानो उपसंहार ही कर दिया है |
"अहमेक्को खलु सुद्धो......" जैसी गाथायें इसी आत्मवाद की पुष्टि करतीं हैं | अन्यथा संख्यातः जीव अनंत हैं --- यह बात सर्वत्र बतायी गयी है |

इसीप्रकार "मैं किसी अपेक्षा से नहीं , बल्कि वास्तव में त्रिकाल शुद्ध हूँ-- यह कहकर आत्मा को परिपूर्ण और भरोसेलायक तत्त्व बतलाया | 
इस कथन ने पर्यायगत दीनता के भाव से मुक्ति दिलायी और अनादि-मिथ्यात्व को नष्ट करने के लिये आत्मानुभूति के लिये प्रेरित किया |

इसी आत्मवाद की निष्पत्ति इन वाक्यों में प्रतिफलित हुई --" आबालगोपाल को भगवान् आत्मा त्रिकाल अनुभव में आते हुये भी अज्ञानी उसे पहिचान नहीं पाता है | और जो इसे पहिचानकर अनुभव कर ले , वही ज्ञानी है |" 
" प्रभो मेरे, तूँ सब बातें पूरा.
पर की आस कहा करे चेतन! 
किन बातें तूँ अधूरा??" 
"हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम |
ज्ञाता - दृष्टा आतमराम ||"
इत्यादि.

३. प्रथम कलिकाल-सर्वज्ञ :--- जो कलिकाल में सर्वज्ञ के अभाव में भी न केवल उनके सद्भाव की सिद्धि करे, अपितु ऐसी सिद्धि करे कि क्षणभर को सर्वज्ञ का विरह ही भुला दे,उसे 'कलिकाल-सर्वज्ञ' कहा जाता है | 
वर्तमान अवसर्पिणी काल के पाँचवे आरे में केवली के अभाव में न केवल जिन्होंने तर्क, युक्ति प्रमाणों से सर्वज्ञता की सत्ता सिद्ध की, अपितु अपनी सशक्त लेखनी से पंचमकाल में भी चौथेकाल का तत्त्वचिंतन प्रस्तुत कर केवली का विरह भुला दिया, वे महासमर्थ आचार्य कुन्दकुन्द इस युग के अद्वितीय महान् व्यक्तित्व थे |

यद्यपि कलिकालसर्वज्ञ की उपाधि आचार्य कुन्दकुन्द के शिष्य आचार्य समंतभद्र को भी प्राप्त थी, क्योंकि उन्होंने भी सर्वज्ञसिद्धि की थी | किन्तु दोनों की सिद्धि में तात्त्विक भेद था |  जहाँ समंतभद्राचार्य की सर्वज्ञसिद्धि परापेक्षी थी, वहीं कुन्दकुन्दाचार्यदेव ने आत्मस्वरूप की सामर्थ्य से सर्वज्ञसिद्धि की थी | देखिये ----

"सूक्ष्मान्तरित-दूरार्थाः, 
प्रत्यक्षाः कस्यचिद्यथा |
अनुमेयत्वतोsग्न्यादि- 
रिति सर्वज्ञ-संस्थितिः ||" --(देवागमस्तोत्र)
अर्थ :- सूक्ष्म (परमाणु आदि), अंतरित (काल की अपेक्षा अप्रत्यक्ष-- राम आदि) एवं दूर (क्षेत्र की अपेक्षा दूरवर्ती -- मेरुपर्वत आदि) पदार्थ किसी न किसी के प्रत्यक्ष अवश्य हैं, क्योंकि वे अनुमान का विषय हैं (और प्रत्यक्ष के बिना अनुमान प्रवर्तित ही नहीं होता है )-- इस प्रकार सर्वज्ञ की सत्ता सिद्ध होती है |

"आदा णाणपमाणं, णाणं णेयप्पमाणमुद्दिट्ठं |
णेयं लोयालोयं , तम्हा णाणं दु सव्वगदं ||"
-(पवयणसारो )
(इसके पाठांतर "तम्हा आदा हु सव्वगदं" भी मिलते हैं, किन्तु इससे कोई अभिप्रायभेद नहीं बनता है |)
अर्थ :-- आत्मा ज्ञानप्रमाण है, ज्ञान ज्ञेयप्रमाण है, और ज्ञेय संपूर्ण लोकालोक है, इससे स्पष्ट है कि ज्ञान (या आत्मा) सर्वगत (सर्वज्ञ-स्वभावी) है |
{ज्ञातव्य है कि सभी गमनार्थक धातुयें अनिवार्यतः ज्ञानार्थक भी होती हैं, अतः उनका 'जाने' के साथ- साथ  'जानना' अर्थ भी लिया जाता है |}

 

यह दोनों गुरु-शिष्यों (आचार्य समंतभद्र कुन्दकुन्दचार्य के साक्षात् शिष्य थे) का दृष्टिभेद नहीं था, बल्कि परिस्थितिभेद था | क्योंकि कुन्दकुन्दाचार्य वस्तु स्वरूप के आधार पर सर्वज्ञसिद्धि कर रहे थे, और समंतभद्राचार्य अन्यमतियों को समझा रहे थे | किन्तु इस प्रक्रिया में गहरा तात्त्विक अंतर आ गया |

पर से वादविवाद एवं आत्मीयों से संवाद की शैली में यही अंतर होता है, जो समंतभद्राचार्य और कुन्दकुन्दाचार्य की सर्वज्ञसिद्धि की शैली में है. 

इस अंतर के अतिरिक्त प्रमुख बात यह भी थी कि जैनों को कुन्दकुन्दाचार्य ने अपने लेखन से सर्वज्ञ का विरह भुलाया था | मानो साक्षात् चौथा काल ही अवतरित कर दिया हो |असल में वे पंचम काल में जन्म लेकर भी साक्षात् चौथाकाल देखकर आये थे, तब पवयणसारो की रचना की थी | अतः उनकी प्रतिपादन-शैली प्रत्यक्षदर्शी की थी, अनुमान लगाने की नहीं |
(मैं पवयणसारो के आधार पर आचार्य कुन्दकुन्द का विदेहगमन बाद में अलग आलेख में स्पष्ट करूँगा | )

सर्वज्ञ के सद्भाव का लाभ यही होता है कि आत्महित एवं आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त रहता है | और आत्मानुभूति की प्रक्रिया को कुन्दकुन्दाचार्यदेव ने इतना सुगम बनाकर प्रस्तुत किया है, कि अब वह किसी भी समर्पित साधक को कठिन नहीं रह गयी है | 
इतिहास प्रमाण है कि जिन्हें भी आत्मानुभूति प्राप्त हुई है, उन्हें कुन्दकुन्दाचार्य के ग्रंथ , विशेषतः समयपाहुड , निमित्त बना है |

साथ ही 'पवयणसार' में उन्होंने जिस तरह केवली और केवलज्ञान का प्ररूपण किया है, वह लाइव- कमेंटरी की तरह है, जिसे कोई प्रत्यक्षदर्शी ही दे सकता है और वह प्ररूपण पाठक को साक्षात् दर्शन जैसा ही अहसास कराता है | कुछ गाथायें देखिये-----

सर्वगतज्ञानापेक्षया भगवानपि सर्वगतो भवति--
ज्ञान की सर्वगतता की अपेक्षा से केवली भगवान् भी सर्वगत (सर्वज्ञ ) हैं (यह बताते हैं---)
"सव्वगदो जिणवसहो, 
सव्वे वि य तग्गदा जगदि अट्ठा |
णाणमयादो य जिणो, 
विसयादो तस्स ते भणिदा ||" (गाथा, २६)
अर्थ :--जिनवृषभ सर्वगत हैं, और जगत् के सभी पदार्थ तद्गत (सर्वज्ञ के ज्ञान में विद्यमान) हैं | जिनेंद्र के ज्ञानमय होने से (वे पदार्थ) उस (ज्ञान) के विषयरूप कहे गये हैं |

वे पदार्थ सर्वज्ञ के ज्ञान में स्थित हैं, इस कथन अर्थ वस्तुगतरूप से नहीं, अपितु ज्ञेयरूप से हैं -- इस तथ्य को स्पष्ट करते हुये आचार्यदेव कहते हैं-
"ण पविट्ठो णाविट्ठो, 
णाणी णेयेसु रूवमिव चक्खू|
जाणदि पस्सदि णियदं,
अक्खातीदो जगमसेसं ||" (गाथा, ३०)
अर्थ :--ज्ञानी ज्ञेयपदार्थों में (उसीप्रकार) न तो प्रविष्ट होता है, और न ही (ज्ञेयपदार्थ उसके ज्ञान में) आविष्ट होते हैं ; जैसे कि चक्षु रूप में (न तो प्रविष्ट होता है, और न ही रूप चक्षु में आविष्ट होता है)| वह इंद्रियातीत होकर संपूर्ण जगत् को जानता और देखता है |

पुनः ज्ञेयरूप में संपूर्ण विश्व केवली के ज्ञान में स्थित है, इस बात को दृढ़ करते हैं -----
"जदि ते ण संति अट्ठा,
णाणे णाणं ण होदि सव्वगदं |
सव्वगदं वा णाणं,
कहं ण णाणट्ठिदा अट्ठा ||" (गाथा, ३२)
अर्थ :--यदि वे पदार्थ ज्ञान में स्थित न हों, तो ज्ञान सर्वगत (सर्वज्ञ) नहीं हो सकता है | चूँकि ज्ञान सर्वगत है, तो वे पदार्थ ज्ञान में स्थित क्यों नहीं होंगे ?

ज्ञेयरूप में ज्ञान में स्थित उन पदार्थों के प्रति केवली की निर्लिप्तता को प्रमाणित करते हुये वे कहते हैं ------
"गेण्हदि णेव ण मुंचदि,
ण परं परिणमदि केवली भगवं |
पेच्छदि समंतदो सो,
जाणदि सव्वं णिरवसेसं || " (गाथा, ३३)
अर्थ :-- केवली भगवान् परपदार्थ को न तो ग्रहण करते हैं, न छोड़ते हैं और न ही (परपदार्थ को) परिणमित कराते हैं | वे सभी पदार्थों को सम्पूर्णतः सब ओर से देखते और जानते हैं |

इतना सूक्ष्मता से और इतने दावे के साथ केवली के ज्ञान और संपूर्ण ज्ञेयों के संबंध के प्रति असंदिग्ध विवेचन या तो प्रत्यक्षदर्शी कर सकता है , या फिर स्वयं केवली |

कुन्दकुन्दाचार्य तो केवली के प्रत्यक्षदर्शी थे | अतः उनके कथन में यह दृढ़ता स्वाभाविक है |

पिछले आलेख में आचार्य कुन्दकुन्ददेव के कलिकालसर्वज्ञत्व की चर्चा की थी | षट्प्राभृत के टीकाकार आचार्य ने लिखा है :-----
" श्रीपद्मनंदि-कुन्दकुन्दाचार्य....नामपञ्चक-विराजितेन चतुरंगुलाकाशगमनर्द्धिना पूर्वविदेह-पुण्डरीकणी-नगर-वंदित-सीमंधरापरनाम-स्वयंप्रभजिनेन तच्छ्रुतज्ञान-संबोधित-भरतवर्ष-भव्यजीवेन श्रीजिनचंद्र-भट्टारक-पट्टाभरण-भूतेन कलिकालसर्वज्ञेन विरचिते षट्प्राभृतग्रंथे.."  
--(द्रष्टव्य,
षट्प्राभृत टीका, प्रशस्ति, पृ.३७९)
इस कथन से आचार्य कुन्दकुन्ददेव के कलिकालसर्वज्ञत्व की बात और पुष्ट है |

अब नये बिन्दु की चर्चा करते हैं --

४:-नयप्रयोग के समर्थ दिग्दर्शक :----
नय का प्रयोग वह विधि है, जो न केवल वस्तुतत्त्व की विवक्षा स्पष्ट करती है, अपितु वक्ता का अभिप्राय को भी समर्थरीति से व्यक्त करती है |

मेरा इस विषय में सभी स्वाध्यायी एवं जिज्ञासु जनों से एक निवेदन है कि वे विचार करें कि जैनदर्शन में 'नय' की वास्तविक परिभाषा क्या है ?
" प्रमाण-परिगृहीतार्थैकदेशे वस्त्वध्यवसायो नयः"
-(धवला, १/१,१,१/८३/९)
इस प्रकार की वस्तु और ज्ञानमूलक परिभाषा, या फिर वक्ता और श्रोता के अभिप्रायों को नय बताने वालीं व्यक्तिमूलक परिभाषायें?

यदि तात्त्विक रूप से समग्र वस्तु प्रमाण की विषय है, और उसके एक अंश को अभिव्यक्त करने वाला नय है, तब तो नय की परिभाषा वस्तु और ज्ञानपरक होनी चाहिये, न कि व्यक्तिपरक | किन्तु जिन वीरसेन स्वामी के धवला ग्रंथ की उपरोक्त परिभाषा है, उसी में " ज्ञातुरभिप्रायो नयः " लक्षण भी कहा गया है | -(धवला,९/४,१,४५/१६२/७)
यहँ तक भी बात में व्यक्तिपरकता नहीं आयी है; क्योंकि ज्ञान प्रमाण है, तो ज्ञाता प्रमाता हुआ | यदि प्रमाण का अंश नय है, तो ज्ञाता से नितांत भिन्न ज्ञान नहीं हो सकने से यह लक्षण भी व्यक्तिपरक नहीं कहा जा सकता है |

किन्तु विचारणीय स्थिति तब बनती है, जब "वक्तुरभिप्रायो नयः" एवं "श्रोतुरभिप्रायो नयः" जैसे प्रयोग मिलते हैं | क्योंकि ये लक्षण प्रायशः व्यक्ति- आधारित ही हैं | किन्तु सटीक व सार्थक होने से इन्हें जिनागम में समुचित आदर मिला है |

क्या आप जानते हैं कि इन दोनों परिभाषाओं के सर्वाधिक समर्थ-प्रयोक्ता आचार्य कुन्दकुन्द ही हैं | निश्चयनय, निश्चय, व्यवहारनय और व्यवहार के कथन की पद्धति का ज्ञान कुन्दकुन्दाचार्य के अभिप्राय की परिधि में ही सही घटित होता है, अन्यथा इनका सटीक अर्थ लगाना/समझना संभव ही नहीं है | जहाँ भी कुन्दकुन्दाचार्यदेव ने इन शब्दों का प्रयोग किया है, वहाँ इनका अर्थ कुन्दकुन्दाचार्यदेव के अभिप्राय के अनुसार ही समझा जा सकता है | ऐसे प्रयोग इतनी प्रचुरमात्रा में मिलते हैं कि " वक्तुरभिप्रायो नयः" तो पूरी तरह कुन्दकुन्दाचार्यदेव के प्ररूपणों को दृष्टिगत रखकर बनी परिभाषा प्रतीत होती है |

वास्तव में नयों के जिन प्रयोगों को कुन्दकुन्दाचार्य देव ने जिस समर्थता और बहुआयामिता के साथ प्रस्तुत किया है, संपूर्ण परवर्ती जैन-वाड्मय उसका ृणी है | {इनके विवेचन और विश्लेषण के लिये ग्रंथ-निर्माण अपेक्षित है, आलेख के सीमित कलेवर में इसका प्रतिपादन संभव नहीं है |}

साहित्य का नियम है कि "लेखक के हृदयगत अभिप्राय से ही  उसके कथ्य के समीचीन-अर्थ की प्राप्ति होती है, शब्दकोशों से नहीं |"

नाम वही 'निश्चय' या 'व्यवहार' दिया जाता है, पर प्रकरण के अनुसार उसके अभिप्राय में बहुत अंतर आ जाता है | इन सबको एक ही समान अर्थ में ग्रहण नहीं किया जा सकता है | अलग-अलग ग्रंथों में तो यह अंतर पाया ही जाता है, एक ही ग्रंथ के अलग-अलग प्रकरणों में भी इनके अभिप्रायों में भिन्नता है| अतः कुन्दकुन्दाचार्यदेव के अभिप्राय के अनुसार ही इनके अर्थ लिये जा सकते हैं | लगभग यही स्थिति 'द्रव्यार्थिक' और 'पर्यायार्थिक' नयों की भी है | 
कुन्दकुन्दाचार्यदेव के इन्हीं कथनों को आधार बनाकर परवर्ती ग्रंथकारों ने कई नय-विषयक ग्रंथ भी (णयचक्को, आलापपद्धति,नयचक्र आदि) लिखे हैं | फिर भी कुन्दकुन्दाचार्यदेव के अभिप्राय को सटीक ढंग से समझे बिना सही अर्थ करना कठिन है |

संभवतः इसीलिये कुन्दकुन्दाचार्यदेव के प्रतिनिधि-ग्रंथों के समर्थ-टीकाकार  अमृतचंद्राचार्य को यह लिखना पड़ा ----     "अत्यन्त-निशित-धारं, 
दुरासदं जिनवरस्य नयचक्रम्|
खण्डयति धार्यमाणं,
मूर्धानं चेव निश्चयतः ||" --( पु. सि. उ.)
अर्थ:-- जिनेन्द्र भगवान् का यह नयचक्र अत्यन्त तीक्ष्ण धार वाला है, इसे हर कोई नहीं प्रयोग कर सकता है | (जरा सी चूक हुई नहीं कि) यह प्रयोग करनेवाले के मस्तक को भी निश्चय ही काट सकता है |

इस दुरासद नयचक्र के आद्य-समर्थ प्रयोक्ता होने के कारण भी कुन्दकुन्दाचार्यदेव संपूर्ण निर्ग्रंथ जैन परंपरा के 'आद्य' बने हैं |

लेखमाला लंबी है, जारी रहेगी. यदि प्रतीक्षा करनी पड़े, तो अपरिहार्य-कारणों से ही ऐसा होगा | आपका धैर्यपूर्ण सहयोग अपेक्षित है|).   क्रमशः

प्रोफ़ेसर सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली