अविरति को आत्मानुभूति 

मोहभाव से कर्म बंधें सब, कर्मोदय से भाव 'मोह' हो, इसका तो निष्कर्ष यही है, भव-बन्धन है मोह की माया…और पढ़ें


किस विधि सत्वर मोह टले? 

भव-अटवी की गहन-विभीषिका, सघन-मोह का तिमिर पले. निज-स्वरूप भी नहीं सूझता, जिनवाणी किस भाँति फले? किस विधि सत्वर मोह टले?…और पढ़ें


यह जैनधर्म का अभिज्ञान है 

सत्य-अहिंसा अरु अचौर्य-तप, संयम और ब्रह्मचर्य आदि सब | पर-उपकार सदाचरणादिक, सब ही धर्मों के निशान ह…और पढ़ें


गृहीत-मिथ्यात्व : नरभव की काली कमाई

जैनदर्शन जीव के दुःखों के लिये किसी अन्य-सत्ता को जिम्मेवार नहीं मानता है | वह तो स्पष्ट रूप से कहता है …और पढ़ें


फिर भी जन्म-दिवस-आकर्षण?

अरे! अजन्मे तुम हो चेतन! फिर भी जन्म-दिवस आकर्षण?  भव-वन-अटन में कलंक जो,    उसी कृत्य पर गौरव-वंदन…और पढ़ें


शास्त्र-रचना के सिद्धांत और 'समयसार'

विशेष-निवेदन :-- इसमें मैंने लेख के अंत में कई सन्दर्भ दिये हैं। उन पर जो चिह्न लगे हैं, वे ही चिह्न लेख के बात में दिये गये हैं। आप सभी सुबुद्ध है और समझ सकते हैं …और पढ़ें


सूत्र-रचना के सिद्धान्त और 'समयसार'

प्रायः ऐसा समझा और समझाया जाता है कि जैन आचार्य जीवों पर करुणाबुद्धि-पूर्वक आत्महितकारी-उपदेश देते थे , और उन्हीं को वे प्रायः…और पढ़ें


वीरशासन जयन्ती

'वीर-शासन-जयन्ती' यह किसी तीर्थंकर-विशेष की महत्ता से जुड़ा पर्व नहीं है। भले ही इसमें अंतिम-तीर्थंकर भगवान् महावीर स्वामी का नाम जुड़ा हो।…और पढ़ें


दान : क्या था और क्या हो गया?

यहाँ तक अतिसंक्षेप में 'दान' के विषय में पारम्परिक विवेचन के बाद अब वर्तमान-परिस्थितियों में 'दान' की दशा के विषय में संक्षेप में समीक्षापूर्वक विवेचन अपेक्षित समझता हूँ। …और पढ़ें


निर्ग्रन्थ-साधुओं का प्रबन्ध-कौशल

जो सभीप्रकार के आरम्भ और परिग्रह के त्यागी, जगत् से अत्यन्त-उदासीनवृत्ति वाले , अनासक्ति के शिखर पर विराजमान , अन्तर्मुख-मुद्रावाले, …और पढ़ें


जयन्ती या जन्म-कल्याणक

यह प्रश्न आज की उस सामाजिक-चेतना की देन है, जिसे हम सुषुप्तप्रायः या विलुप्तप्रायः मान चुके थे | घोर -कलयुग या पंचमकाल के दुष्प्रभाव …और पढ़ें


मुनिधर्म का स्वरूप

इस विषय पर कुछ भी लिखने से पूर्व यह स्पष्ट कर देना अपेक्षित समझता हूँ कि यह आलेख किसी की भी निंदा, स्तुति, समीक्षा, कटाक्ष या …और पढ़ें


देव-गुरु-शास्त्र की विनय

अहो! जिन जिनेन्द्रदेव की अहेतुकी करुणा से प्रवाहित दिव्यध्वनिरूपी मंदाकिनी में आकंठ-निमग्न होकर …और पढ़ें


कुन्दकुन्दाम्नाय में होने का अर्थ

अहो! जिन जिनेन्द्रदेव की अहेतुकी करुणा से प्रवाहित दिव्यध्वनिरूपी मंदाकिनी में …और पढ़ें


आचार्य कुन्दकुन्द का विदेहगमन

कुछ वर्षों पूर्व जैनसमाज की एक प्रतिष्ठित शोधपत्रिका में कुछ लेख प्रकाशित कर एक बुजुर्ग विद्वान् ने चुनौती दी, कि "आचार्य कुन्दकुन्द का विदेहगमन काल्पनिक कहानी है, सत्य और तथ्य नहीं है| …और पढ़ें


कुन्दकुन्दाचार्यदेव के दीक्षागुरु आचार्य जिनचंद

आपको कल के आलेख में बताया था कि वी.नि.सं.५७५ में नंदिसंघ की स्थापना हुई थी, और इसके प्रथम आचार्य का काल ५७५-५७९ तक बताया गया है; किन्तु अगले आचार्य का पदारोहण वी.नि.सं.६१४ में माना है| नंदिसंघ के इन द्वितीय-आचार्य का नाम था--'जिनचंद्र' | इनका पूर्व-परिचय कुछ प्रामाणिकरूप से प्राप्त नहीं होता है |  कुछ इतिहासकारों ने इनका परिचय 'श्वेतांबरत्व के संस्थापकों में एक' के रूप में भी दिया है …और पढ़ें


नंदिसंघ के संस्थापक आचार्य माघनंदि

अंतिम श्रुतकेवली आचार्य भद्रबाहु के बाद आंशिक श्रुतधर-आचार्यों की परंपरा चली | इस परंपरा में मूलसंघ के अंतिम-आचार्य 'अर्हद्बलि'  हुये, जिनके सान्निध्य में वह ऐतिहासिक 'युग-प्रतिक्रमण' आंध्र प्रदेश की महिमा नगरी में 'वेण्या नदी' के तट पर आयोजित हुआ था| इसी सम्मेलन में पत्रवाहक आचार्य धरसेन स्वामी का संदेश लेकर पहुँचा था; जिसके परिणामस्वरूप इन्हीं अर्हद्बलि आचार्य ने पुष्पदन्त एवं भूतबलि (ये इनके प्रचलित नाम हैं, मूल नाम नही …और पढ़ें


आचार्य कुन्दकुन्द क्यों संपूर्ण परंपरा के लिये 'आद्य' बन गये?

हमारी आचार्य-परंपरा के बारे में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जैन-परंपरा के लिये आचार्य कुन्दकुन्द एक प्रतिमान के रूप में बताये गये--

"मंगलं भगवदो वीरो, मंगलं गोदमो गणी | मंगलं कुंदकुंदज्जो, जेण्हं धम्मोत्थु मंगलं ||"

इसी प्राकृत-पद्य का संस्कृत-रूपांतर यह है …और पढ़ें

प्रोफ़ेसर सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली